हर शाम का वह पहर
जब हर किसी में होड़ होती है
जल्दी जाने को अपने घर
शहर की तेज रफ्तार ज़िन्दगी
में होती नहीं किसी को तनिक
फ़िक्र एक प्रेमलता के दर्द की
जिसका पत्थर ही बना हमसफ़र
खड़ी है सहारे जिसके आजतक
निहारती रही अपलक उसकी डगर
जो
किया था प्रेमालाप कभी
इसी जगह इसी मोड़ पर
प्रेमलता कुम्हला सी गई अब
प्रियतम के दीदार को एक नज़र
मिली न छाया स्नेह की उसे
झुलसती रही प्रतीक्षा में
दिनभर
रजनी आई पास जब
साथ लेकर जख्में जिगर
विह्वल हो गई वह अचानक
थरथरा उठे व्याकुल अधर
पर कह न सकी दर्द दिल का
रोती रहीं दोनों रातभर
सुबह होते ही ये अश्रुकण
शबनम बन गये बिखर
रात साथ छोड़ चली गई
संग रह गया फिर वही पत्थर