अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
05.22.2009
 
एक ख़्वाब टूटा हुआ
प्रकाश यादव निर्भीक

ज़ख़्म को मत इतना कुरेदो कोई
कि फिर से यह हरा हो जाए
वरना काँटों भरी राहों में चलना
फिर से हमारा मुश्किल हो जायेगा

एक ही तो गुलाब था ज़िन्दगी में
जिसे देख मुस्कुराते थे कभी हम
उसका न होने का अहसास न कराओ
वरना फिर सँभलना मुश्किल हो जायेगा

अधूरी ख़्वाहिश रह गई तो क्या हुआ
पूरी होती ख़्वाहिश कहाँ किसी की यहाँ
अधूरेपन में ही यहाँ जीने का मजा है
वरना सफ़र में हमसफ़र याद आती कहाँ

दूर होकर भी हर वक़्त आसपास है वो
जीवन के हरपल में एक श्वास है वो
तमन्ना पूरी हुई नहीं हमारी तो क्या हुआ
ज़िन्दगी का टूटा हुआ एक ख़्वाब है वो

मजबूर थे हालात से हम दोनों इस क़दर
चाहकर भी न बन सके हम हमसफ़र
दूर रहकर ही बाँट लेंगे सारे ग़म अपने
"निर्भीक" की तरह कट जायेगा जीवन सफ़र


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें