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02.18.2008
 
एक बूँद हँसी की
प्रकाश यादव निर्भीक

तुमने ही तो सिखाया अब हँसना मुझे,
हँसा ही कहाँ था ज़िन्दगी में मैं कभी;
दूसरोँ की हँसी में अब तक शामिल होता रहा,
खिलखिलाकर हँसना सिखाया मुझे तुमने अभी।

रात के अन्धेरे में ही मैं जीता रहा,
सुबह तो हुई है तुम्हारे आने के बाद;
डर है कि कहीँ किसी की नज़र न लगे,
ग़म की दरिया में न डूब जाऊँ फिर हँसने के बाद।

तुम्हारी हँसी का क़ायल मैं इस कदर हो गया,
अपनी ग़म की चादर को भी पीछे भूल गया;
सीपियों के संग समन्दर में भटकता था मैं,
एक बूँद हँसी की स्वाति का मुझे मोती बना गया।

तुम तो न छलनी करोगे मेरे दिल को कभी,
जैसे किया है बेदर्द बन अपनों ने कभी,
टूट गया इस बार भी मैं, मेरे सनम;
फिर न हँस पाऊँगा मैं इस ज़िन्दगी में कभी।

दर्द ही तो दिया है अब तलक जहाँ ने मुझे,
दर्द से ही तो नाता गहरा हो गया;
कौन कहता है कि दर्द बुरा है दुनियाँ में,
दर्द ने ही तो मुझे यहाँ "निर्भीक" बना दिया।


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