अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
11.25.2007
 
दीदार
प्रकाश यादव निर्भीक

बस एक झलक ही तुम्हें देखने की ललक थी
उसी दिन से
जिस दिन देखा था तुमको
काली झीनी बदरिया मेँ
खुद को छुपाकर
मुझे देखते हुए
पढ़ता रहा हरबार तुम्हारी नयनोँ की भाषा और
करता रहा विचरन
अपने कल्पनालोक में
सतरँगी सपनों को लेकर
सपने टूटते रहे
एक-एक कर हरेक बार
और लगता था जैसे
सपनों का यह गुल रह जायेगा
सदा अधखिला सा
लेकिन आज अचानक हट गयी
वह काली झीनी बदरियाँ
तुम्हारी मनमोहक सूरत से
और
कर पाया मैँ दीदार
अपने ईद के चाँद को जीभर देखना चाहा ही
कि अचानक फिर आ घिरी
काली झीनी बदरिया
मेरे चाँद को फिर से
मुझसे ओझल करने
फिर कभी अगले दीदार तक।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें