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07.12.2008
 
अहसास
प्रकाश यादव निर्भीक

तुम्हारे यादों के गुलाबों को,
रखा है मैंने सहेजकर,
ज्यों का त्यों,
नहीं कुम्हलाई हैं उनकी,
कोई कोमल नाजुक पँखुड़ियाँ,
नहीं कुरेद रहा हूँ उन्हेँ,
बंद हूँ उसके आगोश में चुपचाप,
भौँरा जो हूँ मैं तुम्हारे प्यार का,
तुम्हारी स्नेहशीलता की मिठास,
कराती है दर्ज,
तुम्हारी उपस्थिति की,
इर्द गिर्द मँडराता है वह अहसास,
जिसे छोड़ गई हो तुम,
मेरे अन्तर्मन में,
कहो! कब तक रखूँ उन्हेँ,
यूँ ही सहेज कर या फिर,
छोड़ दूँ उन उम्मीदों को,
जिसकी आस में,
जिया जा रहा हूँ,
कि चहकोगी तुम फिर एक बार,
मेरे मन के आँगन में,
जो हमारी कल्पना थी,
अब सब कुछ सपना सा लगता है!


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