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04.06.2008
 
अधूरा मिलन
प्रकाश यादव निर्भीक

यह मनोहर हसीन शाम,
क्षितिज की अनुपम अरुणिमा,
किसी के मिलन की मधुर वेला,
जो साथ लाती विरह -
मिलन का,

रवि रुक सा गया थककर,
शशि से मिलन की आस लेकर,

उधर सज सँवर कर आ रही,
व्यथित व्याकुल
चन्द्रमा - उर में
मिलन की ज्योति लेकर,
बढ़ाये दोनोँ कदम परस्पर,
दीदार को लेकर त्वरित तत्पर,
रात

मगर आयी साथ लेकर,
कालिमा का काला खंजर,
और हुआ न मिलन,
एक बार फिर,
रह गये दोनोँ तप-तड़पकर,

यों
हसीन शाम फिर ढल गई,
शशि-रवि के अधूरे मिलन लेकर


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