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06.30.2008
 
आशा की कली
प्रकाश यादव निर्भीक

जब उषा के प्रथम,
किरण से लेकर,
उसके विश्राम गृह में जाने तक,
चलकर मैं अनवरत,
लौट आता हूँ,
अपनी कुटिया में खाली हाथ,
और अवलोकन करता हूँ,
अपने अतीत के सफ़र का,
कि कितनी दूरी है अब,
मेरे और तुम्हारे बीच,
तब खो जाता हूँ मैं,
रात के खामोश अन्धेरे में,
जहाँ अब खगों की मधुर,
कलरव भी नहीँ होती,
जिसने दिया था साथ मेरा,
दिनभर की अथक यात्रा में,
तभी अनायास ही,
होने लगता है अभास,
दिल के एक सुनसान कोने में,
तुम्हारी उपस्थिति का,
और सो जाता हूँ मैं,
इस आशा की कली को लेकर,
कि प्रभात की,
प्रथम किरण के साथ ही,
खिलेगी यह कली,
मुस्कुराकर मेरे लिए,
सिर्फ मेरे लिए...


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