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05.09.2014


सैलाब

ऊँघती वीरान सड़कों पर
सड़ती
लावारिस लाशों की बस्ती में
कहीं खो गए क्या तुम ?

संभव है
मौत को मात देती
बची खुची ज़िन्दगी में
शामिल थे तुम भी
फिर क्या हुआ होगा -
भूख प्यास से लड़ न पाए?
या बर्फीली ठंड सह न पाए?
हौसला टूट गया था
या तुम्हारी लाठी
लेकिन तुम हार कैसे सकते हो -
तुम्हारी बूढ़ी हड्डियों से ही
मुझे हर पल जीने की ऊर्जा मिलती थी।

मन मस्तिष्क परेशां है
तुमको खोने के अहसास से
मायूसी चील की तरह
रही सही उम्मीद नोंचती
ज़िन्दगी पहेली-सी
सैकड़ों सवाल करती
प्रतीक्षारत नींद
थक कर सो जाती है।

द्वन्द्व की दहलीज़ पर
घंटों शून्य की ओर
ताकती मौन आँखें
यही सोचती हैं
जीवन तो है ही
अनिश्चित
और अब मौत भी !


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