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ISSN 2292-9754

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09.24.2014


सूरज चाचा

सूरज चाचा कैसे हो,
क्या पहले के जैसे हो,
बिना दाम के काम नहीं,
क्या तुम भी उनमें से हो?

बोलो बोलो क्या लोगे?
बादल कैसे भेजोगे?
चाचा जल बरसाने का,
कितने पैसे तुम लोगे?

पानी नहीं गिराया है,
बूँद बूँद तरसाया है,
एक टक ऊपर ताक रहे,
बादल को भड़काया है।

चाचा बोले गुस्से में,
अक्ल नहीं बिल्कुल तुममें,
वृक्ष हज़ारों काट रहे,
पर्यावरण बिगाड़ रहे।

ईंधन खूब जलाया है,
ज़हर रोज़ फैलाया है,
धुँआ धुँआ अब मौसम है,
गरमी नहीं हुई कम है।

बादल भी कतराते हैं,
नभ में वे डर जाते हैं,
पर्यावरण सुधारोगे,
तो ढेर ढेर जल पा लोगे।


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