अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
06.08.2016


सभी पेश आते इज़्ज़त से

बंदर मामा पहन पाजामा,
नहीँ जा रहे अब स्कूल।
करते रहे अब तलक थे वे,
यूँ ही व्यर्थ भूल पर भूल।

खिसका कभी कमर से था तो,
कभी फटा नादानी में।
फटे पजामे के कारण ही ,
मिली आबरू पानी में।

फटे पाजामा के कारण ही,
हँसी हुई थी शाळा में।
हुई बंदरिया से गुस्ताख़ी,
इस कारण वरमाला में।

अब तो मामा जींस पहनकर,
टाई लगाकर जाते हैं।
जींस बहुत मज़बूत जानकर,
इतराते मस्ताते हैं।

तोड़ दिया सम्बन्ध आजकल,
पूरी तरह पाजामा से।
सभी पेश इज़्ज़त से आते,
अब तो बन्दर मामा से।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें