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ISSN 2292-9754

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04.23.2017


रामू काका का बैल

बैल मरा रामू काका का,
रामू काका रोये।

रामू का था बैल सहारा,
घर का पालनहार।
वही कमाकर तो देता था,
उनको पैसे चार।
इसी बैल के ग़म के कारण ,
सात दिनों न सोये।

हल बक्खर में जुत कर करता ,
बोहनी के सब काम।
रहट खींच खेतों में देता,
पानी सुबह -शाम।
शाम देर तक ही कल उसने,
धान खेत में बोये।

तभी अचानक बड़ा हादसा,
हुआ बैल के साथ।
करते करते काम एकदम ,
उखड़ी उसकी साँस।
गिरा धरा पर पल भर में ही,
प्राण पखेरू खोए।

बैलों का इंसानों के संग ,
रहा जन्म से साथ।
बैल हुआ करते थे उनके,
सचमुच के दो हाथ।
टूट गये रामू के सपने,
जो थे कभी सँजोये।


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