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ISSN 2292-9754

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05.18.2016


राम कटोरे

सिर पर बस्ता लादे शाला,
जाते राम कटोरे।

मिले आम के पेड़ राह में,
झट उस पर चढ़ जाते।
गदरे गदरे आम तोड़कर,
बस्ते में भर लाते।
ऊधम में तो ग्राम चैम्पियन,
पढ़ने में बस कोरे।

ऊपर लगे पेड़ में ऊँचे,
वहाँ पहुँच न पाते।
लक्ष्य भेदने तब गुलेल से,
पत्थर वे सन्नाते।
बीन बीनकर गिरे हुए फल,
भर लेते हैं बोरे।

ऊमर आम बेचकर उनको,
कुछ पैसे मिल जाते।
निर्धन बच्चों की शाळा में,
फ़ीस पटाकर आते।
रामकटोरे मन के सच्चे,
निर्मल, कोमल भोरे।

जाने कितने राम कटोरे,
दुनियां में रहते हैं।
बिना कहे ही मदद दूसरों,
की करते रहते हैं।
लोग समझते इन लोगों को,
हैं नाकारा छोरे।


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