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04.26.2014


प्रकृति की मौलिकता

दो-दो फुट दिन में जुड़वा दें,
दो फुट की बढ़वा दें रात।
किसी तरह से क्यों न बापू,
बड़े-बड़े कर दें दिन रात।

छोटे-छोटे दिन होते हैं,
छोटी-छोटी होती रात।
ना हम चंदा से मिल पाते,
ना सूरज से होती बात।
नहीं जान पाते हैं अम्मा,
क्या होती तारों की जात।

ना ही हमें पता लग पाता,
अंबर की कितनी औकात।
माँ बोली ईश्वर की रचना,
सुंदरतम अदभुत सौगात।
कभी नहीं दे पायेंगे हम,
उसकी मौलिकता को मात।
बापू बोले सदा प्रकृति ने,
हमको दिया समय पर्याप्त।

हम ही ना सूरज चंदा को,
तारों को कर पाते ज्ञात।
एक-एक पल है उपयोगी,
एक-एक कण है सौगात।
यदि समय श्रम का नियमन हो,
हम सब कुछ कर सकते प्राप्त।


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