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ISSN 2292-9754

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10.27.2014


पहली किश्त

मिस्टर बल कुर्सी में धँसे हुये अपनी दृष्टि को टेबिल पर जमाकर कोई ख़ास पत्र पढ़ रहे थे कि किसी के आने की आवाज़ सुनकर उन्होंने सिर उठाया तो देखा कि रामाधार चपरासी सामने खड़ा है।

"क्या बात है तुम कुछ डरे से क्यों लग रहे हो?"

"सर बाहर तीन-चार लोग खड़े हैं कह रहे हैं साहब से मिलना है।"

"इसमें डर की क्या बात है?"

"सर जब मैंने उनसे कहा कि एक कागज़ में अपना नाम पता लिखकर दे दो तो वे कहने लगे हमें कागज़-वागज़ कुछ नहीं चाहिये, हम एम.एल.ए. के आदमी हैं। बातचीत चल ही रही थी कि तीन लोग बिना किसी औपचारिकता के अंदर आ गये और सामने खाली पड़ी कुर्सियों पर बैठ गये। मिस्टर बल के माथे पर बल पड़ गये। वे एक दबंग ईमानदार और कर्त्तव्यनिष्ठ ज़िला जंगल अधिकारी थे। ऊँचाई पूरे छ: फुट गठा हुआ बदन, रोबीला चेहरा और जूडो-कराटे के वे चेम्पियन थे, जाति के जाट थे। उन्होंने रामाधार से कहा तुम जाओ।

"कहिये मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?" वे नम्रता से बोले।

"बल साहब आप ज़िले के फाँरेस्ट आफीसर हैं, सरकार ने आपको जंगल सुधार के लिये और नवीन वृक्षारोपण के लिये करोड़ों रुपये दिये हैं, हम चाहते हैं कि कुछ राशि हमें पार्टी फंड के लिये दे दें, हमारे विधायकजी ने कहा है।"

"अच्छा अच्छा आपको राशि चाहिये ज़रूर मिलेगी, कितनी चाहिये?"

"देखिये आपके यहाँ भ्रष्टाचार तो करोड़ों में होता है, खैर हमें क्या करना है, कुछ भी कीजिये हमें तीन लाख रुपये दे दें तो ठीक रहेगा।"

"हाँ हाँ, क्यों नहीं करोड़ों के भ्रष्टाचार में तीन लाख तो दिया ही जा सकता है। आप एक काम करें पैसे तो मैं आफिस में रखता नहीं हूँ आप शाम को घर पर आ जायें वहीं पर आपको रुपये दे दिये जायेंगे।"

शाम को बल साहब रुपये देने की तैयारी में व्यस्त थे। जैसे ही तीनों लोग बंगले में हाज़िर हुये उन्होंनें गर्मजोशी से उनका स्वागत किया और अपने ड्राइंग रूम में बाइज़्ज़त बिठाया और नौकर को किसी काम से बाहर भेज दिया।

"देखिये भाई साहब तीन लाख रुपये एक साथ देना तो संभव है नहीं, बड़ी राशि है, हाँ तीन किश्तों में हम यह राशि आपको दे सकते हैं, यदि स्वीकार हो तो बतायें?"

तीनों ने एक दूसरे की ओर देखा और इशारों इशारों में स्वीकृति जताई। एक बोला, "चलेगा सर किश्तों में भी चलेगा।"

ना सुनते ही बल साहब उठे, कमरा अंदर से बंद किया फिर एक को पकड़कर दीवाल से दे मारा, दूसरे की गर्दन मरोड़कर ज़मीन पर पटक दिया और तीसरे को गाल में इतनी ज़ोर से चांटा मारा की वह आठ दस फुट दूर जा गिरा। आखिर वह जूडो चेम्पियन तो थे ही। तीनों "मार डाला, मार डाला" चिल्लाते हुये दरवाज़ा खोलकर बाहर भागने लगे। बल साहब ने ज़ोर से कहा "यह पहली किश्त है,जब दूसरी चाहिये हो फिर आ जाना।"

फिर वे बड़बड़ाये अपना बिस्तर तो बँधा हुआ है फिर क्यों डरें, अपना सत्य तो अपने साथ है।


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