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ISSN 2292-9754

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07.30.2014


नदी ताल भर जाने दो

कुंठा के दरवाज़े खोलो.
पवन सुगंधित आने दो।
ओंठों पर से हटें बंदिशें.
बच्चों को मुस्काने दो।

भौरों के गुंजन पर अब तक.
कभी रोक न लग पाई।
फूलों के हँसने की फाइल.
रब ने सदा खुली पाई।

थकी हुई बैठी फूलों पर.
तितली को सुस्ताने दो।

गुमसुम गुमसुम मौसम बैठा.
अंबर भी क्यों चुप चुप है।
पेड़ लतायें मौन साधकर.
बता रहीं अपना दुख है।

बादल से ढोलक बजवाओ.
हवा मुखर हो जाने दो।

नीरस सुस्ती और उदासी.
शब्द कहाँ से यह आये।
इनकी हमको कहाँ ज़रूरत.
इन्हें धरा पर क्यों लाये।

अमृत की बूँदें बरसाओ.
नदी ताल भर जाने दो। 


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