अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
12.25.2015


हमारी माँ अगर होती

हमारी माँ अगर होती, हमारे साथ में पापा।
न आने दुःख कभी देती, हमारे पास में पापा।

सुबह तो दूध हमको रोज़ ही, हँसकर पिलाती थी।
कभी किशमिश कभी काजू कभी, हलवा खिलाती थी।
अगर होती सुबह से ही, कभी की उठ चुकी होती।
हमें रहने नहीं देती, कभी उपवास में पापा।

हमारे स्वप्न जो होते उन्हें, साकार करती थी।
किसी भी और माता से अधिक, वह प्यार करती थी।
नहीं अब साथ में तो यह, जहां बेकार लगता है।
नहीं अब कुछ बचा बाकी, हमारे पास में पापा।

हमेशा नींद से पहले हमें, लोरी सुनाती थी।
इशारे से कभी चंदा कभी, तारे दिखती थी।
हमें है जब ज़रूरत प्यार के, बदल बरसने की।
पड़ा है किस तरह सूखा, भरी बरसात में पापा।

अकेला छोड़ जाने की मुझे, यूँ क्या ज़रूरत थी।
हमारे साथ रह लेती उसे, तो क्या मुसीबत थी।
हमें लगता किसी ने, यूँ नज़र, हमको लगाई है।
छुपा बैठा हमारे घर, हमारी घात में पापा।

बना दो कुछ नियति ऐसी कभी, माता नहीं छूटे।
ज़माना लाख रूठे पर कभी, माता नहीं रूठे।
हमेशा हाथ ममता का, रहे सर पर दुआओं का।
लगाये टकटकी बैठा, इसी की आस में पापा।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें