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ISSN 2292-9754

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10.14.2014


दीपक बनकर‌

सुस्ती दूर भगायें बहना,
झटपट आलस त्यागें।
दीपक बाती से बोला है,
आज रात भर जागें।

तेल सखा से भी वह बोला,
साथ साथ चलना है।
बाती के संग सखे रात भर,
तिल तिलकर जलना है।

बाती बोली काम हमारा,
उजयारा फैलाना।
दुनियाँ की ख़ुशियों की क़ातिर,
खुद जलकर मर जाना।

भले लोग औरों की करते,
रहते सदा भलाई।
सदियों से ही रीत यही है,
जग में चलती आई।

पेड़ नदी सागर झर‌ने नग,
बस देते ही जाते।
अपने ख़ुद के लिये किसी से,
कुछ भी नहीं मंगाते।

बिना किसी भी स्वार्थ भाव के,
हम भी जलते जायें।
दीपक बनकर सारे जग से,
तम को दूर भगायें।


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