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ISSN 2292-9754

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11.13.2014


दाल बाटियों के दिन

फूल हँसे पत्ते मुस्काये,
दाल बाटियों के दिन आये।

आँगन बीचों बीच अभी माँ,
ने कंडे सुलगाये।
बड़े-बड़े बैंगन लेकर फिर,
उनके बीच दबाये।
बैठ पटे पर चाची थीं जो,
बाटी गोल बनातीं।
इसका क्या इतिहास रहा क्या,
था भूगोल बतातीं।
बाल मंडली फिल्मी गाने,
ताक धिना धिन धिन धिन गाये।

धूप हल्दिया ओढ़े थे सिर,
पर सब जेठे सयाने।
नाच दिखाया काकी ने तो,
गाया था कक्का ने।
अपने अपने हुनर और हथ-
कंडे सभी बताते।
लोग अचानक हुए पात्र थे,
जैसे परी कथा के।
ना जाने क्यों छोटी भाभी,
झुका नज़र हँसकर शर्माए।

घी से भरे कटोरों में जब,
गोल बाटियाँ नाचीं।
हृदय हुआ फ़ुटबाल उछाल यह,
बात सौ टका साँची।
लड्डू बने चूरमा के थे,
कितने मीठे मीठे।
मजे मजे से खाए थे बस,
गए गले के नीचे।
खाने वाली पता नहीं क्यों कैसे,
फिर भी नहीं अघाये।

दाल बाटियाँ भटा बना था,
कितना भला भला था।
जिसके रग रग कण कण में बस,
माँ का प्यार मिला था।
बड़े बुजुर्गों ने दिल से ही,
इतना प्यार मिलाया।
मौसम जैसे फूल बना हो,
ताजा खिला खिलाया।
सूरज छुपा छुपाउअल खेले,
बदली फिर फिर स्वांग रचाये।


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