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05.08.2014


चूहे की सज़ा

हाथीजी के न्यायालय में,
एक मुकदमा आया।
डाल हथकड़ी इक चूहे को,
कोतवाल ले आया।

बोला साहब इस चूहे ने,
रुपये पाँच चुराये।
किंतु बताया नहीं अभी तक,
उनको कहाँ छुपाये।

सुबह शाम डंडे से मारा,
पंखे से लटकाया।
दिये बहुत झटके बिजली के,
मुँह ना खुलवा पाया।

चूहा बोला दया करें हे,
मुझ पर हाथी भाई।
कोतवाल भालू है मूरख,
उसमें अकल न आई।

नोट चुराया था मैंने यह ,
बात सही है लाला।
किंतु समझकर कागज‌ मैंने,
कुतर कुतर खा डाला।

न्यायधीश हाथी ने तब भी,
सज़ा कठोर सुनाई।
"कर दो किसी मूढ़ बिल्ली से,
इसकी अभी सगाई।"

तब से चूहा भाग रहा है,
अपनी जान बचाने।
बिल्ली पीछे दौड़ रही है,
उससे ब्याह रचाने। 


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