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ISSN 2292-9754

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06.14.2014


भूल सूधार की लिये

आज वह बड़े सुकून में थी। पिंजरे के आज़ाद पंछी की तरह उसका मन जैसे नीले आसमान मे उड़ जाना चाहता था। उफ़ पिंजरा! वह भी पुरुष का जिसमें स्त्री पर भी नहीं फड़फडा सकती, अपनी मर्जी से साँस लेना भी दूभर। उस पिंजरे का दरवाज़ा एक ही झटके में तोड़कर भाग आई थी। दूसरा मकान पहिले से तय था नौकरी भी सुनिश्चित थी। धीरे-धीरे उसने यह सब तब ही कर लिया था जब वह श्याम के घर में थी।

दिन बीते, महीने बीते पर कुछ ही साल बीते कि उसे पिंजरा याद आने लगा। वहाँ कैद तो थी मगर मैना को तोते का प्यार भी तो मिल रहा था।

सामने से एक गुज़रे ज़माने की बैलगाड़ी निकल रही थी। उसे याद आ गई उस पुस्तक की जिसमें कहीं लिखा था की स्त्री पुरुष गाड़ी के दो पहियों की तरह हैं, ठीक से चले तो जीवन नैया पार हो जाती है। कहीं एक चक्के से भी गाड़ी चलती है? अगर दो में से एक पहिया छोटा बड़ा हो तो भी गाड़ी चलती ही है भले घिसट कर चले।

सामने के घर में रहने वाले बच्चों क़ी खिलखिलाहट सुनाई पड़ने लगी उनके मम्मी पापा की नोंक-झोंक सुनाई देने लगी। क्या नोंक झोंक ही जीवन है?

लड़ना झगड़ना फिर प्यार! ये कैसा संतुलन है, ईश्वर का विधान कैसा अदभुत है। एक सिक्के के दो पहलू, दिन रात, सुख-दुःख, खट्टा-मीठा, भगवान ने जानबूझ के ये उपहार दिए हैं। उसे चाची की बातें याद आ गईं 'बिन नारी घर भूत का डेरा '। माँ की सीख भी कान के पर्दे फाड़ने लगी, बिना पति के औरत कैसी, बिन पानी के मछली जैसी। प्रकृति के बिना पुरुष और पुरुष के बिना प्रकृति क्या अधूरे हैं? ये दोनों मिलकर ही तो संसार कि रचना करते हैं। नन्हें-नन्हें बच्चे गुलशन में खिले ताज़े फूल मिलन का ही तो परिणाम हैं। उसे याद आ गई काम वाली बाई। कैसा टके सा जबाब दिया था ’वह पूछ रही थी जब तेरा मर्द रोज़ तुझे मारता हैं तो छोड़ क्यों नहीं देती उसे।’

"मारता तो क्या हुआ प्यार भी तो करता है।"

उसने अपना सामान उठाया और, और मीरा चल दी अपने श्याम के पास अपनी भूल सुधार के लिए।


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