| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 01.17.2008 |
|
सभ्यता की पहचान |
|
दिन, प्रतिदिन,
हर एक पल, हमारी सभ्यता और संस्कृति में निखार आ रहा है, हम हो गए हैं, कितने सभ्य, कौआ यह गीत गा रहा है। पहले बहुत पहले, जब हम इतने सभ्य नहीं थे, चारों तरफ थी खुशहाली, लोगों का मिलजुलकर, विचरण था जारी, जितना पाते, प्रेम से खाते, दोस्तों, पाहुनों को खिलाते, कभी-कभी भूखे सो जाते। आज जब हम सभ्य हो गए हैं, देखते नहीं, दूसरे की रोटी छीनकर खा रहे हैं, और अपनों से कहते हैं, छीन लो, दूसरों की रोटी, न देने पर, नोच लो बोटी-बोटी, क्योंकि हम सभ्य हो गए हैं, पिल्ले हो गए हैं। बहुत पहले घर का मालिक, सबको खिलाकर, जो बचता रुखा-सूखा, उसी को खाता, भरपेट ठंडा पानी पीता, आज जब हमारी सभ्यता, आसमान छू रही है, घर का क्या ? देश का मालिक, हींकभर खाता, भंडार सजाता, चैन से सोता, बेंच देता, देशवासियों का काटकर पेट, क्योंकि हम सभ्य हो गए हैं। |
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|