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| 06.12.2009 |
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मानवता मर गई है या मार दी गई है |
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कुछ
दिन पहले की बात है। एक दिन शाम के समय मैं विले- पार्ले जाने के लिए
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नंबर की बस पकड़ी। मेरे साथ मेरे एक परिचित भी थे। बस में हम दोनों
लोगों को बैठने के लिए सीट मिल गई। जब बस दो-तीन स्टाप आगे गई तो बहुत
सारे लोग चढ़ गए और बस ठसाठस भर गई। मैं जिस सीट पर बैठा था वहीं एक
औरत आकर खड़ी हो गई। वह बुरका पहने हुए थी।
अपना
बैठना और एक महिला का खड़ा रहना मुझे अच्छा नहीं लगा और उस महिला को
सीट देने के लिए मैं उठना चाहा। हमारे परिचित ने मुझे खींचकर बैठाते
हुए कहा,
"खड़ा
क्यों हो रहे हैं?
अपना
स्टाप तो अभी बहुत आगे है।" मैंने कहा,
"आप
देख नहीं रहे हैं,
पास
में एक महिला खड़ी है। उसको बैठने के लिए अपनी सीट खाली कर रहा हूँ।"
इसके बाद हमारे परिचित ने मेरे कान मे कहा,
"देख
नहीं रहे हैं,
बुरका
पहनी है।" उनकी यह बात सुनते ही मेरे शरीर में आग लग गई। मैंने कहा,
"बुरका
पहनने से क्या हुआ?
वह
हिंदू हो या मुसलमान उससे क्या?
बस
मैं यही जानता हूँ कि वह औरत है और उम्र में मुझसे बड़ी भी। अस्तु
मानवता कहिए या संस्कार,
मुझे
उसे सीट देनी ही है और हिंदू धर्म में कहाँ कहा गया है कि अन्य
धर्मवाले इंसान नहीं। अपने नहीं।"
हमलोगों की बात-चीत अभी चल ही रही थी तबतक वह महिला आगे बढ़ चुकी थी और
एक धोती-कुरताधारी पुरुष ने जो चंदनधारी भी था अपनी सीट उस महिला को दे
चुका था। मेरी आँखे अश्रुपूरित हो गई थीं और मैं एकबार अपने परिचित को
देख रहा था और एकबार उस धोती-कुरताधारी पंडित की ओर,
जिसके
चेहरे पर हलकी सी मुस्कान,
संतुष्टि और सौम्यता तैर रही थी। हमारे हृदय से आवाज आई,
"न
मानवता मरी है न कभी मरेगी पर हाँ कुछ संकीर्ण मानसिकतावालों ने अपनी
मानवता को मार दिया है।" पहले मानवतावाद फिर कोई वाद।
आज भी
मेरी नज़रों में वह धोती-कुर्ताधारी पक्का मानवतावादी,
हिंदूवादी है जबकि मेरे उस परिचित की नज़रों में वह ब्राह्मण के नाम पर
कलंक। मदर टेरेसा की इस उक्ति (मेरे लिए सूक्ति) "जब हम उस मनुष्य से, जीव से प्रेम नहीं कर सकते जो हमारी आँखों को दिखता है तो हम उस ईश्वर से कैसे प्रेम कर सकते हैं जो हमें दिखता ही नहीं।" इसी के साथ मैं अपनी लेखनी को विराम देता हूँ। |
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