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04.30.2008
 

कछुआ हारा, खरगोश जीता
प्रभाकर पाण्डेय


 

प्यारे बच्चों! आज मैं तुम्हें कछुआ और खरगोश की एक नई कहानी सुनाता हूँ। इस कहानी में दौड़ में कछुआ नहीं बल्कि खरगोश ने मारी बाजी। वह कैसे? तो सुनो :-

नदी के किनारे के जंगल में एक कछुआ और एक खरगोश साथ-साथ रहते थे। वे साथ-साथ नदी में डुबकी लगाते और एक साथ बैठकर पढ़ाई भी करते।

एक दिन कछुए ने खरगोश से कहा, "तुम्हें याद है; एकबार मेरे दादा ने तुम्हारे दादा को दौड़ में हराया था?" खरगोश ने कहा, "ये भी कोई भूलनेवाली बात है, मित्र। ऐसी ही घटनाओं से हम जीवन में बहुत सारी अच्छी बातें सीख जाते हैं।" कछुए ने कहा, "क्या तुम मेरे साथ दौड़ लगाओगे?" खरगोश ने हामी भर दी।

दूसरे दिन नियत समय पर एक कौवे की देख-रेख में दौड़-प्रतियोगिता शुरु हुई। कछुआ अपनी धीमी गति से चला जबकि खरगोश तेज दौड़ा और तबतक दौड़ता रहा जबतक दौड़-प्रतियोगिता में निर्धारित मंजिल तक नहीं पहुँचा। कछुआ धीरे-धीरे पर लगातार चलता रहा और जब मंजिल पर पहुँचा तो क्या देखता है कि खरगोश तो मंजिल पर पहुँचकर आराम फरमा रहा है। कछुए ने कहा, "मित्र  खरगोश! इसबार तुम जीत गए लेकिन एक बात मेरी समझ में नहीं आई।" "कौन-सी बात मित्र", खरगोश ने पूछा। कछुए ने कहा, "तुम अपने दादा की तरह बीच में पेड़ की छाँव में आराम क्यों नहीं किया?" खरगोश हँसा और बोला, "मित्र! मेरे दादा हमेशा मुझसे कहते रहते हैं कि 'आराम हराम है'; गाँधीजी ने भी गाया है कि 'जो सोवत है सो खोवत है' और आज का युग भी पहले जैसा नहीं रहा। आज के युग में लक्ष्य-प्राप्ति के लिए तत्परता, निरंतरता के साथ ही साथ शीघ्रता भी अति आवश्यक है। इसलिए मैंने मंजिल पर पहुँचकर ही आराम करना उचित समझा।"

प्यारे बच्चों! क्या आप हमें बताओगे कि इस कहानी से आपने क्या सीखा?


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