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04.13.2008
 

हिन्दी: वाक्य-विन्यास पद्धति और विभक्ति
प्रभाकर पाण्डेय


 हिन्दी के पूर्ण विकास में कुछ बाधाएँ हैं और ये बाधाएँ हिन्दी की अपनी न होकर हिन्दी के विद्वानों द्वारा सृजित की गई हैं। हिन्दी विद्वानों की आपसी मतभिन्नता के कारण हिन्दी को बहुत कष्ट उठाने पड़े हैं। विद्वानों के इन मतभेदों (हम बड़े, हम बड़े) रूपी पाटों के बीच हिन्दी ही पिस रही है और अभी भी ये विद्वान अपने पांडित्य-प्रदर्शन के लिए, अपने-अपने (अविचारित) विचारों को थोपने के लिए प्रयासरत हैं। सच में इन यथार्थहीन बाधाओं का व्याकरण से भी कुछ लेना-देना नहीं है। केवल अपनी ढफली अपना राग की वजह से इन समस्याओं को जगह मिली है। हिन्दी के विद्वानों को एकमत होकर इन समस्याओं का निदान करना चाहिए ताकि हिन्दी का विकास पूर्णरूपेण हो सके।

आज हिन्दी को राजभाषा का दर्जा पाए लगभग पचास साल से उपर हो गए, पर इन पचास सालों में भी विद्वानों ने इन कथित बाधाओं को दूर करने के लिए एकमत होने की अनिवार्यता महसूस नहीं की है।

इन बाधाओं में मुझे जो सबसे बड़ी बाधा दिखाई दे रही है वह है, 'वाक्य-विन्यास की अनेकरूपता।'  यह एक ऐसी बाधा है जिसपर अगर समय रहते विचार नहीं किया गया तो भविष्य में यह हिन्दी को बुरी तरह अपने चपेट में लेकर इसके विकास के मार्ग को अवरुद्ध कर सकती है।

आज भी हिन्दी के विद्वान यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि विभक्तियों (से, ने, को, में आदि) को शब्दों (संज्ञा, सर्वनाम) से सटाकर लिखें या हटाकर। आज भी कुछ संस्कृत-प्रेमी, संस्कृत के आधार पर इन विभक्तियों को सटाकर लिखने के पक्ष में हैं। मेरा तो सिर्फ यह कहना है कि संस्कृत-प्रेमी होना गलत नहीं है पर एक बात ध्यान देने योग्य है कि 'हिन्दी' 'संस्कृत' नहीं है; यह एक अलग भाषा है। यह भी कोई आवश्यक नहीं है कि संस्कृत के सारे नियम हिन्दी में चलें ही या चलाए ही जाएँ। हिन्दी एक पूर्ण वैज्ञानिक भाषा है और यह अपनी सरलता, सहजता, प्रवाहिता आदि के द्वारा स्वयं निर्णय ले लेती है कि इसका रूप क्या होना चाहिए।

आज 'गीताप्रेस' गोरखपुर जैसी सम्मानित एवं सुप्रसिद्ध संस्था के साथ ही साथ दूसरे बड़े-बड़े विद्वान भी विभक्तियों को सटाकर लिखते हैं।

जैसे- रामने सीताको देखा।

अगर यह क्रम चलता रहा तो हो सकता है कि एक दिन ये लोग 'रामचरित मानस' के दोहों, चौपाइयों आदि में भी अपना नियम घुसेड़ दें और इसको एक नया रूप दे दें।

विभक्तियों को दूरकर या सटाकर लिखना गलत नहीं है लेकिन जब बात हिन्दी के विकास की हो तो एकरूपता आवश्यक है।

हिन्दी की वैज्ञानिकता, प्रवाहिता, सरलता आदि के विचार से देखें तो संज्ञाओं के साथ विभक्तियों को हटाकर तथा सर्वनामों के साथ सटाकर लिखना उपयुक्त होगा जैसा कि बहुत सारे लेखक करते हैं और जो राजभाषा विभाग द्वारा भी मान्य है।

जैसे- १. राम ने सीता को देखा।

२. उसने मुझसे कहा।

(कुछ विद्वान विभक्तियों को सर्वनामों से हटाकर लिखने के पक्ष में भी हैं।)

अब आइए, संज्ञाओं के साथ विभक्तियों को सटाकर लिखने पर उत्पन्न होनेवाली विद्वत-लीला को प्रणाम कर लें।

१. एक एम.एल.ए. के कहने पर ('के' विभक्ति को कहाँ सटाएँ ?)

२. माधुरी नेनेने कहा । (नेने में एक और ने)

३. बकरी की में-मेंमें (में मेंमें) मैकूको कविता नजर आती है। (भगवान ही मालिक है।)

(होना चाहिए में-में में या में में में और मैकू को)

स्वयं विचार करें और हिन्दी के विकास-रथ को आगे बढ़ाएँ।

जय हिन्दी। जय भारत।


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