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02.25.2008
 

हिन्दी में नई एकपदीय क्रियाएँ : भोजपुरी के परिपेक्ष्य में
प्रभाकर पाण्डेय


 हिन्दी की एक बहुत बड़ी विशेषता यह है कि यह संयुक्त, मिश्रित आदि भावों या कर्मों आदि को व्यक्त करने के लिए आवश्यकतानुसार संज्ञा, विशेषण, क्रियाविशेषण और क्रिया पदों में करना, होना, देना, लेना आदि सरल क्रियाओं को लगाकर एक बड़े पैमाने पर द्विपदीय या अनेकपदीय क्रियाबोधक शब्दों का निर्माण कर लेती है । ये क्रियाएँ इसकी प्रकृति के अनुसार खरी उतरती हैं और अर्थ को भी पूरी तरह से स्पष्ट कर देती हैं।

जैसे- उदित होना, वापस होना, स्पष्ट करना, रक्तरंजित होना, चाकू से काटना, खुर्पी से निराई करना इत्यादि।

हिन्दी के इसी गुण के कारण हिन्दी में एकपदीय क्रियाओं के निर्माण की आवश्यकता महसूस नहीं होती और द्विपदीय या अनेकपदीय क्रियाबोधक शब्दों से काम डगर जाता है।

अगर भोजपुरी की बात करें तो हिन्दी की एक बोली (संगिनी, सहचरी) होने के कारण यह विशेषता  इसमें भी है और हो भी क्यों नहीं! क्योंकि हिन्दी के ये सारे प्रयोग भोजपुरी कलई के साथ भोजपुरी जनमानस के द्वारा प्रयोग किए जाते हैं और हिन्दी भी तो बेझिझक, सादर इन जनभाषाओं, बोलियों के शब्दों, प्रयोगों आदि को अपनाकर अपनी प्रकृति के अनुसार ढालकर अपनी अथाह शब्द-सम्पदा में वृद्धि कर लेती है।

भोजपुरी हिन्दी के इन बहुपदीय क्रियाबोधक शब्दों को तो अपनाती ही है पर यह अपनी प्रकृति के अनुसार खेल-खेल में इन बहुपदीय क्रियापद की जगह एकपदीय क्रियापद का निर्माण भी कर लेती है जो अपने अर्थ को चरितार्थ करते हुए जनमानस द्वारा प्रयोग किए जाते हैं।

जैसे- मटियाना (मिट्टी से माँजना) के आधार पर सबुनियाना (साबुन से धोना), रखियाना [1.राखी से माँजना 2. राख लगाना (बरतनों आदि की पेंदी में)] आदि प्रयोग खूब चलते हैं। इसी प्रकार जूतियाना के आधार पर चपलियाना (चप्पल से मारना), लठियाना/लउरियाना <लउर = लाठी> (लाठी से मारना), ढेलियाना (1. ढेले से मारना 2. ढेले से पोंछना), चटकनियाना (चटकन से मारना) आदि।

और भी प्रयोग भोजपुरी उदाहरण और हिन्दी अनुवाद के साथ देखें -

1. रोगियाना- रोग से पीड़ित होना (भोजपुरी प्रयोग- धनवा रोगियाता <हिन्दी- धान में रोग पकड़ रहा है>)। इसी आधार पर मिर्गीयाना (मिर्गी रोग से पीड़ित होना), बोखरियाना/बुखरियाना (बुखार से पीड़ित होना), टीबीआना (टीबी से पीड़ित होना), पीराना (पीड़ा होना), फुंसीयाना- फुंसी से पीड़ित होना (भोजपुरी प्रयोग- पुरा देहियाँ फुंसीयाइल बा<हिन्दी- पूरे शरीर में फुंसियाँ हो गई हैं>)

2. भोजपुरी में मोटाना (मोटा होना) के आधार पर पतराना (पतला होना) और दुबराना - दुबला होना (भोजपुरी प्रयोग- का जाने काहें लइकवा दुबराता <हिन्दी- पता नहीं क्यों लड़का दुबला हो रहा है>)। इसीप्रकार करियाना-  काला होना (भोजपुरी प्रयोग- घामे में मति जा, करिया जइब<हिन्दी- धूप में मत जाओ, काला हो जाओगे>), साँवराना (साँवला होना), गोरहराना (गोरा होना) इत्यादि भी प्रयोग खूब चलते हैं।

3. भोजपुरी में दुगुनाना के आधार पर तिगुनाना, चौगुनाना, पंचगुनाना, सतगुनाना, अठगुनाना इत्यादि प्रयोग भी खूब चलते हैं।

4. घसियाना- घास से भर जाना (भोजपुरी प्रयोग- खेतवा घसिया गइल बा<हिन्दी- खेत घास से भर गया है>), रेड़ना- फसल के मुँह में अन्न आने लगना (भोजपुरी प्रयोग- धनवा रेड़ता<हिन्दी- धान में बालें आ रही हैं>), मोजरियाना (मंजरी आना), पंखियाना- पंख निकलना (भोजपुरी प्रयोग- चिरई के बचवा पंखियाता<हिन्दी- चिड़िया के बच्चे को पंख निकल रहे हैं>), अँठुलियाना (अँठुली बनना), मोछियाना- मूँछें निकलना (भोजपुरी प्रयोग- बाबू त मोछियाता<हिन्दी- बाबू को तो मूँछे निकल रही हैं>), रेहियाना (रेह निकलना) इत्यादि ।

कुछ और प्रयोग देखें-

खबरियाना (खबर करना/देना), गुस्साना के आधार पर घमंडियाना (घमंडी होना / घमंड करना), गोड़ियाना (नाली आदि को गोड़/पैर से साफ करना), मुठियाना (मुट्ठी से पकड़कर....करना), अंगुरियाना (अँगुली से खोदना), नखियाना (नाखून से खोदना), खजुआना (खजुली करना/होना), गरियाना/गलियाना (गाली देना), खीखीयाना (खी-खी करके हँसना), फींचना (कपड़े धोना), उकठना (पौधे आदि का मर जाना), तेजियाना (जल्दी-जल्दी करना), चोखियाना (धार तेज करना), मुराना (धार का कुंठित होना), खिसियाना/रिसियाना (नाराज होना), बहटियाना (बहाना करना), लकड़ियाना (लकड़ी जैसे सूखकर पतला होना), कीड़ाना (कीड़ा लगना), गभिनाना (गाभिन करना/होना), बसियाना (बासी होना), सहूआना (साहू यानि सज्जन होना), रेरियाना (किसी को रे रे कहना), सरपियाना (शाप देना), लटियाना (सर के बाल का रूखा होना), सवीकारना (स्वीकार करना), मुकियाना (शरीर पर मुक्की लगाना) ,पेन्हाना (दूहते समय पशु का दूध देने के लिए तैयार होना), चरमराना (चरर-मरर करना), गोंइयाना (इंजन आदि का गों-गों करना), भकभकाना (भकभक करना), भुनभुनाना (मुँह में धीरे-धीरे और स्पष्ट बोलना) इत्यादि।

इसमें से कुछ क्रियाएँ या ऐसी क्रियाएँ हिन्दी में प्रयोग भी की जाती हैं पर अल्प मात्रा में । पर यदि हिन्दी में भी इन एकपदीय क्रियाओं को या इन एकपदीय क्रियाओं के आधार पर नए एकपदीय क्रियाबोधक शब्दों का प्रयोग किया जाए तो निस्संदेह इससे हिन्दी की अथाह शब्द-सम्पदा बढ़ेगी ही और अपने संयुक्त, यौगिक भावों आदि को दर्शाने के लिए प्रयोगकर्ता के पास अधिकाधिक शब्द उपलब्ध होंगे।

इस लेख का यह निष्कर्ष न निकाला जाए कि मैं करना, होना आदि शब्दों को लगाकर बहुपदीय क्रियाएँ बनाने के पक्ष में नहीं हूँ पर मेरा तो यह कहना है कि एकपदीय क्रियाबोधक शब्दों को प्रयोगना चाहिए। अगर ये प्रयोग हिन्दी की प्रकृति के खिलाफ होंगे तो अपने आप बहरिया जाएँगे। जय हिन्दी ।।

 



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