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ISSN 2292-9754

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06.17.2014


एक माँ की व्यथा

रात के साढ़े बारह बज चुके थे पर भाग्यवती की आँखों से नींद गायब थी। लेटे-लेटे वह अतीत की यादों में खो गई। उसे वह दिन आज भी भली-भाँति याद है जब उसने तीसरी संतान के रूप में भी बेटे को जन्म दिया था। भाग्यवती और उसका पति धनपत दोनों उस दिन ख़ुशी के मारे फूले नहीं समा रहे थे। तीसरे बेटे राकेश के जन्म के समय पहला बेटा राजबीर छः साल, दूसरा बेटा राजेश तीन साल का था। उस दिन गाँव की सभी औरतें उसे बधाई देने आई थीं। गाँव में हर औरत भाग्यवती के भाग्य को सराहती थी "भाग्यवती के तीन –तीन बेटे हैं। वह तो बेटी की शादी, दहेज की सारी चिन्ताओं से बच गई। बुढ़ापे में उसकी बहुत सेवा होगी। आखिर तीन-तीन बेटों की माँ है।" उन दिनों भाग्यवती के चेहरे पर तीन बेटों की माँ होने का गर्व साफ झलकता था। वह अपने भाग्य पर खूब इतराती।

"मैं पुलिस में हूँ ईमानदारी से कमाता हूँ। दूसरों की तरह बेईमानी नहीं करता फिर भी मेरी इतनी आमदनी है कि हम अपने बेटों को अच्छी शिक्षा दे सकें। हम इन्हें बहुत पढ़ाएँगे। देखना मेरे बेटे अच्छे-अच्छे पदों पर नौकरी करेंगे," एक दिन भाग्यवती के पति धनपत ने कहा।

तीनों बेटों को अच्छे से अच्छे विद्यालयों में पढ़ाया। माता-पिता ने तीनों की छोटी से छोटी आवश्यकता पूरी की। पढ़ाई से जुड़ी हर सुविधा देने के बावजूद भी छोटे बेटे राकेश को छोड़कर राजेश और राजबीर हमेशा पढ़ाई में कमज़ोर ही रहे।

"आज राजबीर का आठवीं कक्षा का परिणाम आने वाला है याद है?" भाग्यवती ने पूछा।

"हाँ याद है, पता नहीं इस लड़के का क्या परिणाम आएगा मेरी तो भगवान से यही प्रार्थना है कि बस यह पास हो जाए। पढाई में तो इस लड़के का मन ही नहीं लगता," धनपत ने कहा।

राजबीर पास हो जाए इसी इच्छा से भाग्यवती भी बार-बार भगवान के सामने हाथ जोड़ती रही। जब राजबीर घर लौटा तो उसका उदास चेहरा देखकर माँ-बाप सब समझ गए। जिस बात का डर था वही हुआ, राजबीर फेल हो गया था। अगले ही दिन राजबीर को घर पर ट्यूशन देने के लिए अध्यापक रखा गया। धनपत स्वयं भी कभी-कभी राजबीर को पढ़ाता परन्तु घरवालों की लाख कोशिशों के बावजूद राजबीर का मन पढ़ाई में नहीं लगता। जो रुपये उसे किताब खरीदने के लिए मिलते वह उन रुपयों से फ़िल्म देखने चला जाता। एक दिन धनपत को राजबीर की गणित की किताब से फ़िल्म की टिकट मिली। पिता ने कड़ाई से पूछा, एक थप्पड़ भी लगाया पर राजबीर बार-बार यही कहता रहा "मैं फ़िल्म देखने नहीं गया। मेरा एक दोस्त है निकेतन, वो स्कूल से भागकर फ़िल्म देखने जाता है। उसने कल मेरी गणित की किताब ली थी आज लौटाई है उसी ने रखी होगी।" धनपत ने बेटे की बात पर विश्वास कर लिया। राजबीर अब बात-बात पर झूठ बोलने लगा। राजबीर माता-पिता को खुश करने के लिए कहता "माँ इस बार देखना मैं बहुत अच्छे नम्बरों से पास हो जाऊँगा तुम्हे निराश नहीं करूँगा।" बेटे के मुख से ऐसी बातें सुनकर भाग्यवती को विश्वास होने लगा कि इस बार तो राजबीर पास हो ही जायेगा। धनपत राजबीर को कभी-कभी पढ़ाता था इसलिए उसे राजबीर से कम उम्मीद थी फिर भी वह यह आशा पाले था कि शायद इस बार बेटा पास हो जाए। आठवीं कक्षा का परिणाम आया, राजबीर इस बार भी फेल हो गया। धनपत और भाग्यवती को निराशा ने घेर लिया। राजबीर ने भी कुछ दिन बाद स्पष्ट कह दिया "मैं नहीं पढ़ना चाहता मुझे पढ़ना अच्छा नहीं लगता।" पिता के लाख समझाने के बावजूद भी उसने पढ़ाई छोड़ दी।

धनपत और भाग्यवती को अब राजेश और राकेश से ही उम्मीद थी। परन्तु वक्त के साथ राजेश ने भी उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। वह दसवीं कक्षा में फेल हो गया। उसने भी माता-पिता से साफ कह दिया की अब मैं भी नहीं पढ़ूँगा।

राकेश बचपन से ही पढ़ने में अव्वल रहा। भाग्यवती हमेशा अपने पति से कहती "निराश मत हुआ करो इन दो नालायकों ने तो हमारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया पर अपना राकेश तो हमेशा से ही पढ़ने में होशियार रहा है। देखना, राकेश हमारा नाम ज़रूर रोशन करेगा कोई बड़ा अफसर बनेगा।"

दोनों बड़े भाई कभी–कभी राकेश को भी ज़बरदस्ती फ़िल्म दिखाने ले जाते धीरे-धीरे राकेश को भी सिनेमा का चस्का लग गया अब वह कक्षा में अव्वल तो नहीं आता था पर पास हो जाता था। जब बारहवीं कक्षा में आया तो बुरी संगत के लड़कों से उसकी दोस्ती हो गई घर से विद्यालय के लिए निकलता पर विद्यालय न जाकर दिन भर मस्ती करता, ताश खेलता, फिल्में देखने जाता। पढ़ाई से उसका भी मन उचट गया था और बारहवीं कक्षा में राकेश फेल हो गया। भाइयों के नक्शे–कदम पर चलते हुए उसने भी पढ़ने से इंकार कर दिया।

माता-पिता के सारे सपने एक-एक कर चूर हो गए। धनपत को अब चिन्ताओं ने घेर लिया। धनपत की नौकरी के अब कुछ वर्ष ही बाकी थे। एक दिन उसने अपने तीनों बेटों से कहा "मैंने तुम्हे हर सुविधा दी, तुम्हारी हर ज़रूरत को पूरा किया, उसके बावजूद तुम तीनों ने मुझे और तुम्हारी माँ को निराशा के अलावा कुछ नहीं दिया। सारी ज़िंदगी मैं नहीं कमा सकता इसलिए अब तुम तीनों कोई काम–धंधा तलाश करो, ऐसे घर में कब तक बैठे रहोगे। मैं और तुम्हारी माँ हमेशा तुम्हारा ध्यान रखने के लिए जीवित नहीं रहेंगे।"

तीनों भाइयों ने बहुत कोशिश की परन्तु कहीं कोई अच्छा काम उन्हें नहीं मिला। भाग्यवती ने एक दिन धनपत से कहा "तीनों रोज किसी अच्छी नौकरी की तलाश करते हैं परन्तु कहीं अच्छी नौकरी ही नहीं मिलती।"

"मिलेगी कैसे? पढाई करते तभी तो नौकरी मिलती," गुस्से में धनपत ने कहा।

"अगर नौकरी नहीं मिली तो आपके रिटायर हो जाने के बाद ये घर कैसे चलेगा? हमारे बाद इन तीनों का क्या होगा अब आप ही कुछ करो। अपने महकमें में ही किसी तरह जुगाड़ करके इन्हें किसी काम पर लगाओ," भाग्यवती ने कहा।

"तुम जानती हो मैंने कभी कोई गलत काम नहीं किया। अपने महकमें में जुगाड़ का मतलब होगा रिश्वत देकर काम कराना। मैं यह नहीं कर सकता," धनपत ने कहा।

"वो हमारे बेटे हैं। हम उनके लिए जो कुछ कर सकते हैं करना होगा। हमारे बाद उनका पेट भरने वाला कोई नहीं। अगर अपने सिद्धांतों को भी त्यागना पड़े तो अपने बच्चों के लिए हमें यह भी करना होगा," उदास स्वर में भाग्यवती ने कहा।

भाग्यवती और धनपत बहुत देर तक चुपचाप और उदास वहीं बैठे रहे। धनपत उस रात सो भी नहीं पाया, उसके हृदय में बहुत उथल-पुथल मची थी। आज वह अपने भीतर बहुत कुछ टूटा हुआ महसूस कर रहा था।

धनपत ने कुछ लोगों को रिश्वत देकर, कुछ उच्च अधिकारियों की सहायता से भी तीनों बेटों को पुलिस में सिपाही भर्ती करवा दिया। भाग्यवती ने तीनों बेटों की नौकरी लग जाने की ख़ुशी में सारे मोहल्ले में मिठाई बाँटी थी। उस दिन धनपत खुश भी था और उदास भी।

तीनों बेटों के विवाह धूमधाम से किये गए। उस दिन भाग्यवती के पैर ज़मीन पर नहीं टिक रहे थे उसके घर तीन-तीन बहुएँ आई थी। उसका घर खुशियों से भर गया था परन्तु खुशियाँ ज़्यादा दिनों तक नहीं रह पाई। भाग्यवती पर दुखों का पहाड़ उस दिन टूट पड़ा जब उसने अपने पति को एक दुर्घटना में खो दिया। जिन बेटों से सेवा की उम्मीद थी वो बेटे पिता की मृत्यु के कुछ दिन बाद ही माँ को अकेला छोड़कर, अपनी बीवियों को साथ लेकर दिल्ली चले गए। तीनों बेटों की पोस्टिंग दिल्ली में थी। उस दिन भाग्यवती कई घंटे रोती रही।

अब वह अकेलेपन से जूझ रही थी। उसका स्वास्थ्य दिन-ब-दिन गिरने लगा। अकेली जान के लिए खाना बनाना उसे भारी लगने लगा। कई बार रात का बासी खाना सुबह खाती, कभी सुबह का बचा खाना रात में खाती। जब किसी दिन तबीयत बिगड़ जाती या खाना बनाने का मन नहीं करता तो दो-दो दिन तक भूखी लेटी रहती। हर दिन उसे पहाड़-सा लगने लगा। पति की पेंशन से उसका गुज़ारा चल रहा था। इसी तरह अकेलेपन को झेलते हुए उसे दस साल बीत गए पर इन दस सालों में भी किसी बेटे ने अपनी माँ को साथ रखना ज़रूरी नहीं समझा। कभी–कभी बेटे फोन कर लेते थे। राजबीर से बात करते हुए कई बार भाग्यवती ने कहा "बेटा, मेरा यहाँ मन नहीं लगता। एक-एक दिन मुश्किल से कटता है। कुछ दिन अपने पास बुला ले। तुम लोग तो मुझे भूल ही गए हो।"

"माँ, तुम यहाँ आ जाओगी तो घर की देखभाल कौन करेगा? तुम्हे घर की देखभाल के लिए गाँव में ही रहना होगा," यह कहकर राजबीर ने फोन काट दिया। भाग्यवती के आँसू उस रात थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे।

एक रोज़ जब भाग्यवती छत पर कपड़े सुखा रही थी तो कपड़ों से गिरे पानी के कारण उसका पैर फिसल गया और वह छत से आँगन में गिर पड़ी। उसकी चीख सुनकर पड़ोसी दौड़े आए। जल्दी से उसे शहर के अस्पताल ले जाया गया।

"गिरने के कारण इनकी घुटने से ऊपर एक हड्डी टूट गई है। ईलाज के लिए २०,००० रुपये जमा करा दीजिए," डॉक्टर ने भाग्यवती के साथ आए गाँव के लोगों से कहा।

यह ख़बर तीनों बेटों तक पहुँचाई गई। पड़ोसी काका ने फोन पर तीनों लड़कों से विनती की कि "बेटा अपनी माँ को साथ ले जाओ, उसका ईलाज कराओ। यहाँ कौन है उसकी देखभाल करने वाला।"

छोटा बेटा राकेश माँ को दिल्ली ले आया। उसे यहाँ आए एक हफ्ता हो गया था। यहाँ आने के बाद बेटे, बहू ने उसकी बहुत सेवा की। बहू सबसे पहले खाना भाग्यवती को खिलाती, अपनी सास के कपड़े धोती, बालों में तेल लगाती। आज लेटे-लेटे भाग्यवती यही सोच रही थी "मैं कैसी माँ हूँ, जो अपने ही बेटों को कपूत समझ रही थी। नौकरी से घर लौटकर मेरे बेटों को खाना बनाना पड़ता, बर्तन धोने पड़ते, शाम को थके हुए घर आते हैं, कैसे कर पाते काम इसलिए ही बहुओं को साथ ले आए और मैं इन्हें गलत समझती रही। मेरी चिंता मेरे बेटे करते हैं तभी तो मेरे बारे में जानने के लिए तीनों फोन किया करते थे। मैं इन्हें स्वार्थी कहती थी परन्तु स्वार्थी तो मैं हो गई थी। मेरे बेटे तो बहुत अच्छे हैं।" इसी उधेड़बुन में उसकी नींद गायब थी।

ख़ुशी-ख़ुशी दिन बीतने लगे। उसे यहाँ आए २५ दिन कब पूरे हो गए उसे पता भी नहीं चला। इस बीच राजबीर और राकेश भी उससे तीन-चार बार मिलने आए। राकेश ने अब तक अपनी माँ के पैर की टूटी हड्डी का ईलाज नहीं कराया था। भाग्यवती भी अब लकड़ी के सहारे धीरे-धीरे खड़ी होने लगी। भाग्यवती सोचती "राकेश के पास वक्त नहीं है जब भी उसके पास वक्त होगा वह मुझे अस्पताल ज़रूर ले जायेगा।" शाम को थककर लौटे बेटे से अस्पताल कब लेकर जायेगा? बार-बार यह पूछने का उसका मन नहीं करता था। अक्सर रात में बेटे को गोद में लिटाकर उसके बालों को कई देर तक सहलाती जैसे हृदय का सारा प्यार उस पर लुटा देना चाहती हो।

एक दिन शाम को टेलीविज़न देखते हुए भाग्यवती बोली, "बेटा, अब मैं हमेशा अपने बहू, बेटे और पोते के साथ रहूँगी। इतने अच्छे परिवार को छोड़कर, मैं गाँव में अकेली क्यों रहूँ? मैं अब वापस नहीं जाऊँगी।" यह सुनकर राकेश और उसकी पत्नी अनीता को सांप सूंघ गया। राकेश को दूसरे कमरे में आने का इशारा करके अनीता वहाँ से चली गई।

"आप तो कहते थे कि माँ की इतनी सेवा करो कि वह चलने लायक हो जाए और जब धीरे धीरे चलने लगेगी तो वापस गाँव छोड़ आओगे पर आपकी माँ तो मेरी छाती पर मूंग दलना चाहती है अब मैं एक दिन भी इनका कोई काम नहीं करूँगी।" अनीता ने गुस्से में कहा।

राकेश ने उसे समझाते हुए कहा "यदि उस वक्त माँ को नहीं लाता तो गाँव में हमारी क्या इज्जत रह जाती। राजबीर भैया ने कहा था, जाकर माँ को ले आओ, फिर मैं अपने घर ले जाऊँगा। जब मैं माँ को ले आया तो उन्होंने भी माँ को ले जाने से इंकार कर दिया। मैंने सोचा था जब थोड़ा सा चलने लायक हो जाएगी तब गाँव छोड़ आऊँगा। मुझे भी कहा पता था कि माँ को अपनी सेवा कराने का इतना शौक है कि जाने से इंकार कर देगी। तुम चिंता मत करो। अब देखो, मैं कैसे मुसीबत से पीछा छुड़ाता हूँ।"

"माँ, राजबीर और राजेश भी तो तुम्हारे साथ रहना चाहते होंगे, कुछ दिन उनके यहाँ भी रह आओ।" राकेश ने माँ से कहा।

भाग्यवती को बेटे की यह बात ठीक लगी आखिर उसके लिए तीनों बेटे बराबर हैं। उसने तय किया कि वह पहले बड़े बेटे राजबीर के घर जाएगी फिर मंझले बेटे राजेश के घर रहने जाएगी। राकेश ने राजबीर को फोन करके सब बता दिया "माँ अब गाँव वापस नहीं जाना चाहती। हम तीनों के साथ रहना चाहती है। मैं आज उन्हें आपके घर छोड़ जाऊँगा। मेरे घर आए उन्हें एक महीना हो गया है, मैं अब नहीं रख सकता। अब आप रखिये।"

जब माँ को लेकर राकेश राजबीर के घर पहुँचा तो राजबीर की पत्नी ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया, "यह बुढ़िया मेरे घर में नहीं रहेगी। अगर ये मेरे घर में रही, तो मैं ज़हर खा लूँगी। फिर सासुजी आप भी खुश रहना। भाग्यवती को ऐसा लगा जैसे किसी ने एक साथ उसे हज़ार कोड़े लगा दिए हों। उसकी आँखों से आँसू झरने लगे, भरे गले से भाग्यवती ने कहा, "राजबीर बेटा, मैं तुम्हे सुखी देखना चाहती हूँ। मेरे यहाँ रहने से तेरे घर की सुख-शांति खतरे में पड़ती है तो मैं नहीं रहूँगी। तुम दोनों खुश रहो।" यह कहकर वह राजबीर के घर से बाहर आ गई।

मंझले बेटे राजेश का घर वहाँ से पचास कदम की दूरी पर ही था। राकेश को डर था कि कहीं राजेश या भाभी भी ऐसा कुछ न कह दें जिसके कारण उसे माँ को वापस अपने घर ले जाना पड़े। उसने एक तरकीब सोची। राजेश के घर में प्रवेश करते ही राकेश ने कहा "भैया, हम कुछ दिन के लिए बाहर घूमने जा रहे हैं इसलिए तुम्हे माँ को अपने पास रखना ही होगा।" राजेश तक भी यह ख़बर पहुँच चुकी थी कि माँ अब वापस गाँव नहीं जाना चाहती। न चाहते हुए भी वह माँ को रखने के लिए मजबूर होना पड़ा।

राजेश के परिवार को भाग्यवती का यहाँ रहना पसंद नहीं था इसलिए अपने माता-पिता के बताए रास्ते पर चलकर भाग्यवती का पोता अरुण, जो अभी आठ साल का ही था, वह भी अपने माता-पिता की तरह अपनी दादी से बात नहीं करता था। भाग्यवती को यहाँ हफ्ते में एक बार नहाने दिया जाता। बहू से जब नहाने के लिए पूछती तो बहू संतोष कहती, "कौन देखने आ रहा है तुम्हें, जो रोज़-रोज़ नहाकर दुल्हन बनना चाहती हो। कोई ज़रूरत नहीं है। मैं हमारा बाथरूम रोज़ गन्दा नहीं करवा सकती।" भाग्यवती खून के घूँट पीकर चुप रह जाती। अपने कपड़े स्वयं धोती, उसके खाने के बर्तन अलग कर दिए गए थे जो उसकी चारपाई के नीचे पड़े रहते थे। सबके खाना खा लेने के बाद बचा हुआ खाना संतोष भाग्यवती की थाली में डाल जाती। उसकी चारपाई घर की बालकनी में डाल दी गई थी। दिल्ली में, मई के महीने में पड़ने वाली ज़बरदस्त गर्मी में वह पंखे के बिना सोने के लिए मजबूर थी। सारी रात करवटें बदलती रहती। मच्छर बार–बार कानों में भिनभिनाते। पसीने से सारा शरीर भीगा रहता, साड़ी के पल्लू से हवा डालते हुए हाथों में दर्द हो जाता पर रात थी कि ख़त्म ही नहीं होती थी। इस अपमान को सहते हुए कितनी बार उसने भगवान से प्रार्थना की, "हे भगवान, क्या इतने दुःख दिखाने के लिए तूने मुझे जिन्दा रखा है। अब बरदास्त नहीं होता अब अपने पास बुला ले। राकेश के पापा आप तो चले गए पर मुझे यहाँ क्यों छोड़ गए? देख रहे हो, जिन बेटों से सेवा की उम्मीद थी वो मेरा कितना ध्यान रख रहे हैं। अब मुझे अपने पास बुला लो।" पोते अरुण के दोस्त जब भी घर आते तो वह भाग्यवती से कहता, "जा, छत पर चली जा वरना तुझे देखकर मेरे दोस्त मेरा मजाक उड़ाएँगे।" भाग्यवती गीली आँखे पोंछते हुए छत पर चली जाती। घंटों धूप में पसीने से भीगी बैठी रहती। आँखे झरना बन गई थी जिनसे आँसू बहते रहते थे।

भाग्यवती ने राजेश से कई बार उसे राकेश के घर छोड़ आने को कहा तब राजेश कहता "तुम्हारी तो नौटंकी ही चलती रहती है। वहीं तो थी इससे पहले, तब क्यों आई थी यहाँ? आज मुझे यहाँ छोड़ आओ, कल वहाँ छोड़ आओ। फालतू वक्त नहीं है मेरे पास। जिस दिन थोड़ा भी वक्त होगा छोड़ आऊँगा।"

एक रोज़ राजेश माँ को छोड़ने राकेश के घर गया। राकेश और अनीता दोनों घर पर थे। माँ को देखते ही राकेश ने कहा, "अभी तो तुम्हे यहाँ से गए बीस दिन भी पूरे नहीं हुए और तुम इतनी जल्दी यहाँ चली आई। हमने तुम्हारी बहुत सेवा कर ली, हम और नहीं कर सकते। तुम कितनी स्वार्थी हो, हम सब पर बोझ बन गई हो। ये सोचकर तुम्हारी सेवा की थी कि थोड़ा चलने लगोगी तो गाँव छोड़ आऊँगा पर तुमने तो जिंदगी भर यहाँ रहने का सोच लिया।" भाग्यवती ने निराश आँखों से उसे देखते हुए भरे स्वर में कहा, "बेटा, मुझे गाँव छोड़ आओ। अब मैं किसी पर बोझ नहीं बनना चाहती। तुमने मेरा ईलाज तो नहीं कराया पर इस टूटे पैर से ही मैं जिंदगी घसीट लूँगी। तूने और तेरी बीवी ने मेरी एक महीने सेवा की है मैं तेरा ये एहसान नहीं भूलूँगी। मुझे अभी गाँव छोड़ आ।" तभी राजबीर भी वहाँ आ पहुँचा उसने आते ही कहा "कौन सा घर? वो हमारा भी घर था। हमें रुपये की ज़रूरत थी और उस घर की अच्छी रकम मिल रही थी हमने उसे बेच दिया। हमें तो वहाँ रहना नहीं था उसका रखकर क्या करते। तुम्हारा क्या है तुम तो कुछ साल की मेहमान हो। अगर हम पर बोझ नहीं बनना चाहती हो तो कहीं जाकर मर क्यों नहीं जाती।" भाग्यवती का चेहरा रो-रोकर लाल हो चुका था। तीन बेटों के होने के बावजूद आज उसे लग रहा था जैसे उसने अपना सब कुछ खो दिया है और इस दुनिया की भीड़ में वह अकेली रह गई है। आज उसे अपना नाम भाग्यवती होने का बहुत दुःख हो रहा था। बार-बार गाँव की औरतों के शब्द उसके कानों में गूँजने लगे "भाग्यवती की बुढ़ापे में बहुत सेवा होगी आखिर तीन-तीन बेटों की माँ है।"


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