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ISSN 2292-9754

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04.08.2016


बाबा

कुछ साल पहले मैंने आज के दिन ही पहली बार किसी लाश को छुआ था। छुआ क्या था दरअसल बारह घंटे तक उस लाश का हाथ पकड़े बैठी रही थी। सिसकती रही थी। सोचती रही थी। कोसती रही थी। भगवान से माँगती रही थी। "सब ले लो भगवान् जी...पर ये मत करो" पर भगवान कुछ नहीं सुनते। उन्होंने कुछ नहीं सुना।

मरने के बाद... शरीर अकड़ जाता है। ठंडा पड़ जाता है। फूल जाता है। ये सारी लिखी, पढ़ी और सुनी हुई बातों को उन बारह घंटे मैंने बहुत क़रीब से महसूस किया था। मेरे "बाबा" की लाश थी। लाश नहीं... "मिट्टी" लाश लिखना डरावना लगता है... ख़ासकर तब, जब कोई अपना हो। बाबा की मिट्टी घर के आँगन में रखी थी... उसी आँगन में जहाँ वो अपना बेंत लेकर बेवज़ह ही अम्मा को चौके में देख झाँकते हुए चक्कर लगाते रहते थे, जहाँ बैठकर कभी-कभी शौक़ में वो शाम को सब्जी भी काटते, जहाँ वो अपने ही अंदाज़ में खड़े होकर सिगरेट फूँकते थे, जहाँ खड़े होकर वो सबको ख़ूब खरी-खरी सुनाते और अपना ग़ुस्सा दिखाते थे।

उसी आँगन में आज के दिन वो बड़ी ख़ामोशी से लेटे थे। बिल्कुल शांत। आज उन्होंने शाम से ही किसी को नहीं समझाया था कि जब ज़मीन पर उनके बिस्तर लगें तो क्या-क्या उनके बिस्तर पर हो... उनका मसंद.. उनके दो तकिये... तकिये के ऊपर रखने वाला छोटा तोलिया... उनका पानी का लोटा जिसके ऊपर ढकी छोटी प्लेट, उनकी खाँसी की दवाई, सिगरेट और माचिस की डब्बी। आज कुछ भी उनका उनके आस- पास नहीं था। बिना किसी को कुछ भी समझाए बस आँगन में लेट गए थे आकर... माफ़ कीजिये...ख़ुद नहीं लेटे थे। आज तो उन्हें ज़बरदस्ती यहाँ आँगन में लेटा दिया गया था...बिना कुछ सोचे-समझे। बिना उनके बिस्तर बिछाये। शायद किसी को उनकी परवाह ही नहीं थी। वरना अपने इस घर में वो अपने बैठक में पड़े तख़्त के आलावा कहीं बैठना तक पसंद नहीं करते थे। और आज आँगन में लेटे थे।

नाक से खून आ रहा था... सब कह रहे थे... आता है... आता है... इंसान मर जाता है तो आता है....रुई लगा दो...कुछ नहीं होता... रुई लगा दी गयी... लगायी क्या शायद भर दी गयी थी। बाबा को अब साँस भी नहीं आ रही... दर्द हो रहा होगा मेरे बाबा को...मैं सोच रही थी। पागल की तरह बार-बार उनके चेहरे पर हाथ फेरती... ये सोचकर कि उठ जायेंगे अचानक... वो जा ही नहीं सकते थे।

सब चीख रहे थे...चिल्ला रहे थे। जो जितना तेज़ रो सकता था रो रहा था। मैं चुपचाप हाथ पकड़कर बैठी थी उनका...बस सिसक रही थी। मैं तेज़ रोना नहीं चाहती थी... क्यों रोती... जबकि मुझे भरोसा था कि वो उठ जायेंगे सबेरे तक। मैं उस वक़्त बस बाबा का हाथ पकड़कर महसूस कर रही थी कि अकड़ की वज़ह से उनकी उँगलियों ने मेरी हथेली को जकड़ लिया था। एक पल तो लगा था जैसे जाग गए हो वो... पर भ्रम था... मरा हुआ आदमी वापस नहीं आता। सब तो बोलते हैं, कितनी बार सुना था। मेरे बाबा भी मर गए थे...अब वो नहीं आएँगे... मुझे ये भरोसा नहीं हो रहा था। होता भी कैसे? बड़े ताव से वो कुछ घंटे पहले ही बोले थे...

" देखो... आ गयीं सब रिपोर्ट नार्मल... अरे कछू नहीं भओ... कल घर जाने की कह दई डॉक्टर ने...।" एक दिन पहले सबको इतराते हुए हॉस्पिटल में यही बता रहे थे। जो भी हॉस्पिटल में उनसे मिलने आ रहा था उसे ये हिदायत भी दी जा रही थी कि वो ज़्यादा तेज़ ना बोले क्योंकि "कुर्सी पर पूजा सो रही है ... वो आधी रात में आगरा से आ गयी हमाई तबियत का सुनके"।

उन्हें बहुत ख़ुशी थी कि मैं आधी रात को आ गयी थी उनकी तबियत ख़राब का सुनकर। उस वक़्त अपने से ज़्यादा बाबा को मेरे रात भर जगे होने की चिंता थी। मेरी ही क्यों... उन्हें हर बात की चिंता थी... सबने खाना खाया या नहीं खाया... कौन-कौन हॉस्पिटल में उन्हें देखने आया.. कौन-कौन नहीं आया ... और सबसे ज़्यादा ये कि..."पूजा जानती हूँ तुमाये बाप का जन्मदिन है कल"।

"तुमाये बाप" ... बाबा के लिए पापा... उनके बेटे कम "हमाये बाप" ज़्यादा थे... और मैं पापा की बेटी कम उनकी नातिन ज़्यादा थी।

अगले दिन पापा का जन्मदिन था। अगले दिन बाबा घर आने वाले थे। अगले दिन और भी बहुत कुछ होने वाला था शायद....जो नहीं हुआ... कुछ भी नहीं हुआ...

हाँ उस अगले दिन से पहले थोड़ी सी बातचीत हुई थी।

मैंने कहा था, "जा रहे हैं हम लोग। कल सुबह तो आ ही जाओगे घर। देखो डॉक्टर ने कहा है। बिल्कुल सही हो यार आप।"

बाबा ने उदासी से... हॉस्पिटल के बेड पर बिल्कुल ऐसे ही बैठे हुए जैसे तस्वीर में हैं, कहा था, "ठीक है..."

मैंने उनकी उदासी को भाँपते हुए कहा, "अच्छा सुनों ये दवाई हैं ... खा लेना...।"

बाबा ने लापरवाही से कहा था, "अरे अब काहे की... अब ठीक है हम...!"

मैंने मुस्कारते हुए कहा था, "अरे यार खाओ...वैसे आ रही है एक सुन्दर सी नर्स दवाई खिलाने..."

बाबा - थोड़ा मुस्कुराये...लेकिन आज ये नहीं बोला था कि "पिटोगी बहुत तुम"।

बस ... ये कहकर हॉस्पिटल के रूम से बाहर आते हुए मैंने एक बार पीछे मुड़कर उन्हें देखा... देख रहे थे मुझे ... उदासी से... बिना कुछ बोले...जानते थे...कुछ ही मिनटों में बहुत दूर जा रहे थे... बहुत दूर... इसलिए बोले तक नहीं थे ठीक से... चले गए थे... अगली सुबह घर आने को कहा था... झूठ बोला था... उसी रात आ गए थे घर ... और लेटा दिए गए थे घर के आँगन के बीचो-बीच... चीख़ पुकार के बीच... कोई फ़र्क नहीं था उनको हमारे रोने, चीखने, चिल्लाने का...वो तो आराम से सोये थे मेरा हाथ पकड़कर।


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