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10.21.2007
 
राग का विराग
पवन शाक्य

ये आँसू नहीं हैं, सांत्वना या दर्द के,
ये मोती हैं, मेरी जिन्दगी भर के।
चाहतें उधर हों न हों मगर,
इधर तो चाहतों के चिराग जलाये बैठे हैं।
तुम कैसे हो सकती हो दफ़न मेरी यादों में,
तुम्हारी पायलों की छम-छम आज भी कानों में सजाये बैठे हैं।
उन मधुर स्वर लहरियों को क्या नाम दूँ?
जिन्हें तुम गुनगुनाती थी, हमारे लिये,
उन्हीं सुमधुर लहरियों के राग का विराग कैसे भुला दूँ?
ये जो बढ़ गई हैं दूरियाँ, हमारे तुम्हारे बीच की,
बहुत कोशिश करता हूँ, उन्हीं दूरियों को मिटाने की।
मैं कविताओं में अक्सर, तुम्हीं को बनाता हूँ,
तुम्हारी यादों को जगाता हूँ, और जुल्फों को सँवारता हूँ।
नये नये तरीकों से तुम्हीं को बुलाता हूँ,
और वक्त वे वक्त उन्हीं को गुनगुनाता हूँ।


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