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10.21.2007
 
होली की हुल्लड़ियाँ  (लड़ाई-झगड़े)
पवन शाक्य

ज सबेरे हम जगे, गली में मचो भयो हुड़दंग,
भूरे ऊपर डारि गयो
, कल्लू कालो रंग,
कल्लू कालो रंग
, कि भूरे खिसियाने घूमें,
हम होली नहीं खेलते
, तो क्यों रंग में डूबें?
कहें
पवन कविराय, गली में हुल्लड़ मच गयो,
रंग पिचकारी छोड़
, हाथ में लठ्ठ उठाय लओ। 


होली मिलिबे हम चले, मस्त अहेरी चाल,
पीछे पड गयो डोकरा एक, खाकर गोला भाँग,
खाकर गोला भाँग, पकड़बे हमकूं भागो,
तूने का मोकूं समझ, रंग हम पर डारो।
कहें ‘पवन’ कविराय, नशेड़ी कींच में गिर गयो,
और ऐसो गिरो कि सीधो वालो हाथ टूट गयो। 

मुखिया, मटरू, मंगली, लगे पियन सब संग,
ना काहू की जेब में, रूपया हैं सब तंग,
रूपया हैं सब तंग, जिकिर कुछ बीच में चल गयी,
तब तक बोतल तीन, गले के बीच उतरि गयी,
कहें ‘पवन’ कविराय, गले सब सबके पड़ गये,
रूपया कौन चुकाय, बात पर जूत उतरि गये।

छोटू-मोटू चलि पड़े, भरि पिचकारी हॉफ,
भई निशाना बालिका एक, मूड हो गया ऑफ,
मूड हो गया ऑफ, कि छोटू जी घबराये,
होते जब तक रफूचक्क, डोकर इतने में आये,
छोटू तो झट भगि लिये, मोटू रहे घुटियाय,
डोकर ने झट आय कें, दीनों हाथ सटाय,
दीनों हाथ सटाय, कि होली मँहगी हो गयी,
दो अंगुर की बात, गज भरी लम्बी हो गयी।
कहें ‘पवन’ कविराय, पिचकारी बन्दूकें बनि गयी,
रंग भंग में मिलो, कि सब होली सी मनि गयी। 



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