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10.21.2007
 
ढूँढता हूँ जिन्दगी में आशियाना
पवन शाक्य

ढूँढता हूँ जिन्दगी में आशियाना,
गम का मारा जिन्दगी में चाहता हूँ मुस्कराना,
चाहता हूँ एक पल को पुष्प का स्पर्श कर लूँ,
                       कंटकों की चुभन को मैं चाहता हूँ भूल जाना।

चाहता उड़ कर चलूँ उस आसमाँ में,
प्यार का हो आशियाना जिस जहाँ में,
फैल जायेगी खुशी सारी फिजां में,
                       गर मुझे कोई सिखा दे मुस्कराना।

पंथ से अनभिज्ञ होकर घूमता हूँ,
जिन्दगी के मोड़ को भी देखता हूँ,
हर नजर मुस्कान अपनी खोजता हूँ,
                       काश, मुझको भी सिखा दे आज कोई मुस्कराना।

पर कहीं ऐसा न हो कि बीत जाये सब जमाना,
सूख जाये पुष्प और लूट जाये सब खजाना,
फिर हमारे आँसुओं पर तुम कभी मत मुस्कराना,
                         जिन्दगी का आशियाना मत मिटाना।
                         मैं, ढूँढता हूँ जिन्दगी में आशियाना।


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