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ISSN 2292-9754

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12.07.2014


सदानीरा ही रही मैं
मूल लेखक : विद्या पैनिकर (प्रपैचुअल वेटनेस)
प्रवीण शर्मा

पसीने के
मोती में
चमकते;
श्रांत- क्लांत
मन में
तिरते
दूध के रिश्ते…………
ज़िन्दगी की
भागम-भाग में
नहलाना,
सजाना,
खिलाना,
पिलाना
मनुहार से!
इठलाती
नन्हीं
गुड़िया को;
फिर भेजना
पाठशाला में
ठुमकती
दुलारी को;
गोदी में गुड़िया थी
भीग जाना कपड़ों का
गंदा हो जाना बार-बार
पर
छि! छि! की बू नहीं थी उसमें
बढ़ जाती थी सुंदरता उनकी
महसूसती थी मैं
ख़ुद को भाग्यशाली!
* * * *
बदहवास सी
भागती
धर्म क्षेत्र
‘कुरुक्षेत्र’
दफ्तर की
राह पर;
पहुंचती हमेशा ही देर से
तयशुदा समय के बाद……..

गीले केश
कभी नहीं
सूख पाते;
टपकता
शीतल जल
गंगाधार सा……
चेहरे-
शरीर के
हावभाव में
झलकता
आशंकित मन
सहमी सी
धड़कन
कुछ कहती सुन सांय-सांय
भीतर वह होती गुंजायमान
* * * *
जीवन के
अंतिम मोड़ पर
वही
ठुकराई मां के
आंसू
झरोखों में;
लुढ़कते गालों पर
फिर गर्दन पर
भीगता
आंचल;
जहां
पली थी
नन्हीं कली
लाडली
दुलारी
रानी
बिटिया!

Perpetual Wetness
First published in Indianreview journal: http://indianreview.in/perpetual-wetness-vidya-panicker/


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