अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
03.06.2008
 

पंख थे परवाज़ की हिम्मत ना हो सकी
पारुल


पंख थे परवाज़ की हिम्मत ना हो सकी
दुनियावी उसूलों से बग़ावत ना हो सकी।

इक रूह थी उड़ती रही बेबाक़ फ़लक पर
बरसों से क़ैद जिस्म में हरकत ना हो सकी ।

बिखरी पड़ी हैं घडियाँ फ़ुरसत की चार सू
फ़ुरसत ही खर्च करने की फ़ुरसत न हो सकी।

हो लाख शोर ओ गुल अब जल्से तमाम हों
तनहाई मगर दिल से रुख़्सत ना हो सकी ।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें