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ISSN 2292-9754

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02.06.2015


नज़रिया

निकलो
नज़रिये की
धुंध से बाहर

देह की चटकीली
चाह से आगे

अपेक्षाओं का
बोझ उतारो
मन में बसाओ
रूह का
रिश्ता बनाओ

प्रेम करो मुझे...
और
फिर जानो
कि
कोयला नहीं हूँ मैं
बल्कि
जीवन के संघर्षो की
भट्टी में
निरंतर तप के
बन चुकी सोना हूँ!!


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