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09.23.2007
 
वो लम्हा
पाराशर गौड़

तुमने हौले से छुआ जो तन
भावना मधुर मधुर हुई थी
शोखियों में घुल गया मधुर था
सप्तरंगी हो गया था मन। 

बदरा प्रेम का
फैला था, तुषार सी
खिल उठी थी मैं
जैसे बूँद ओस की
जब पड़ी थी मुझपे आपकी
स्नेह की पहली किरन,

शोखियों में घुल गया मधुर था
सप्तरंगी हो गया था मन। 

सपनों में लगे थे पंख
सोच बावरी सी हो गई थी
क्या कहूँ मैं अपने आपको
खुद अपने आपसे जुदा हो गई
वशीभूत हो गयी थी सोच
तुमसे जब बाँधे बंधन

शोखियों में घुल गया मधुर था
सप्तरंगी हो गया था मन। 

नयनों में असर था
आपकी खुमारी का
खुशबू थी हवाओं में
आपकी देह की गंध का
था असर, मगर,

थे खुले अभी भी अधखुले नयन,
शोखियों में घुल गया मधुर था

ऐसी थी दशा मेरी
कि पर्वतों को छू लूँ
थाम के मैं सागर
गगन को चूम लूँ
बनके मीत जब तुम
समा गये थे मन,

शोखियों में घुल गया मधुर था
सप्तरंगी हो गया था मन। 

थी अडिग शिखर सी
मौन थी मैं झील सी
विराम था विचारों पे
थी सोच पारदर्शी सीस सी
आपके एक ही स्पर्श ने
नींव हिला दिए कई
जलजले उठ खड़े हुए
तोड़के सीमाएँ , तोड़के बंधन

शोखियों में घुल गया मधुर था
सप्तरंगी हो गया था मन। 


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