अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
08.29.2007
 
वेदना
पाराशर गौड़


वेदना मन की मैं तुमसे कहती रही
उसको सुन सको तुम में इतनी फुरसत नहीं
मौन को तोड़ के कुछ कहो तो सही
घावों में लगादे मरहम जो वो बात
वो बात तुम में है ही नहीं...।

बात मेरी तुमने हँसियों में छोड़ दी
चलते चलते उसमें एक और बात जोड़ दी
जोड़ तोड़ छोड़ की भूमिकाओं में
तुम्हारे संग चलते चलते पीछे रह गई
पीछे मुड़के देखा तो साथ साया भी नहीं .. घावों...।

तुमने जो भरी आह सुनके मैं तो डर गई
तुमको इतनी भी खबर नहीं कि मैं
मैं टूटते टूटते टूट गई
मैं तो अपनी सीमाओं में बंध के रह गई
तुम किसी सीमा को लाँघ के आ सको
तुम में इतना हौसला भी नहीं.. घावों...

किश्तों में बँट के रह गई निगोड़ी ज़िन्दगी
कगार की आग में झुलस के रह गई बंदगी
अरमान पिस गये सिलवटों के बीच
सरेआम हो गई निलाम आज सादगी
सच्च तो दब के रह गया झूठ के तले
सच को सुन सको तुम
तुम में इतना हौसला भी नहीं.. घावों..

बेमानी हो गये हैं रिश्ते अब
रिश्तों में दरारें आ गई
जिन राहों पे चले थे हम
उनमें मोड़ आ गये थे कई
बिखर गये वो टूटकर काँच की तरह
सोचती हूँ वो टूटे तो टूटे क्यों बेवजह
बैठकर सोचो तो प्रश्नों की कमी नहीं.. घावों...

यूँ तो मैंने अपनी ओर से शुरूआत की कई
देखिये नसीब अपना ज़िन्दगी फँस के रह गई
थोड़ी मैं चली थी थोड़ा तुम चलते सही
बीच के फासले सिमट के आते वहीं
अनजान तुम बने रहे हाल मेरा वही
बढ़ते गये फासले धुन्ध छाती गई
जोड़ दे जो हम तुम को वो बात
वो बात अब तो दीखती नहीं .. घावों..

अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें