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12.09.2007
 
समय का फेर
पाराशर गौड़

पिछले दिनों मैं..
अपने एक मित्र जो
किसी हिन्दी संस्था के अध्यक्ष थे-
उनसे मिलने उनके घर गया
देखा.... वे...,
कागज़ों में उलझे थे।
आपकी जानकारी के लिए बता दूँ
वे पिछले दिनों...
संस्था के चुनाव में हार गए थे
अब वे –
वर्तमान से भूत हो गए थे।

मैंने कहा –
कहिए, क्या हो रह है
समय कैसा कट रहा है?

वे बोले –
क्यों घावों पे नमक छिड़क रहे हो
पिछली बातों को याद दिला रहे हो।

मैंने कहा... नहीं... नही... मान्यवर –
मैं, मैं तो, अपनत्व के नाते पूछ रहा हूँ

उनका उत्तर था
अगर दोस्ती के नाते पूछते हो तो, मित्र
आजकल – मैं,
अपने नाम के आगे लगे “भूतपूर्व” को
रगड़ रगड़ के मिटा रहा हूँ!!


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