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08.29.2007
 
समय
पाराशर गौड़

ये समय तू रुक जरा
मेरी सुन मेरे साथ क्या हुआ
ये दिलकी पीड़ क्यो जगी
ये ऐसा क्यों हुआ......।

उगते दिनको देखा
देखी तपती दोपहरी
लड़खड़ाती शाम देखी
ढलती रात भी.........

संभल संभल के ना संभल सका
ये कौन है जो मेरी
तरह का हो गया......।

आते जाते वक्त, देखा
छूटता साथ साया भी
बदलती देखी रेखा
रेखायें हथेली की
ये बदलते साये क्यों हुए
ये ऐसा क्यों हुआ...... ।

ब्¡द पानी की हम
समन्दर मे ढूँढते रहे
सपने देखे दिन में हमनें
आँख मलते हुए
तारे सो गये है
है चाँद खो गया......।

ढलता चाँद देखा
छुपते तारे भी
मुस्कुराता चेहरा देखा
देखी रोती आँख भी
ये कौन है जो
तपती रेत में हवा दे गया ...।


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