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08.30.2007
 
दर्द का अहसास
पाराशर गौड़

दिल में शूल सा चुभो गया कोई
रूठ कर हमसे जब गया कोई
प्रीत में दर्द एक नया............
नया देगा मीत हमको जब कोई... दिलमें...

हम भी कितने भोले थे
बात बात में उनको दिल दे गये
खुशियाँ देदी उनको उम्र भर की
खुद सारे ग़म सह गये.........
चोट तो लगी लगी
बात जब ये हो गई ....दिलमें...

रात भर जागकर जागते रहे
यादों की उलझनों में उनकी उलझे रहे
निगोड़ी चाँदनी भी रात भर............
दिल को जलाती रही और हम जलते रहे
हो गये अकेले थे जब......
जब हमसे हमारा दिल ले गया कोई...दिलमें

पीड़ रात की......
किसी से कह सके न हम
सीके ओंठ अपने
उस दर्द को पी गये थे हम
आसमां की ओर.........
टकटकी लगाके देखते रहे
सूनेपन में ओढ़े मौन को...
नियति उसको अपनी मानते रहे
हादसा हुआ... छल गया...
छल गया प्रेम को प्रेम में जब कोई ...दिलमें...

रात आके हमसे कह गई
इस दर्द का इलाज है ना कोई
खालीपन का दौर कह गया
दौर ऐसे जाने और कितने है अभी
सूनेपन ने दिल को छू लिया
दिल ने उसको अपना कह के सह लिया
शब्द हो गये है गूँगे...गूँगे
दिल ने दिल से चोट खाई जब कोई ...दिलमें...


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