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05.17.2009
 
भूख
पाराशर गौड़

जब कोई मुझ से पूछता है कि,
क्या, तुमने कभी
नियति को देखा है ?
तो,
न जाने क्यूँ तब
मेरी निगाहें बरबस
मेरी हथेलियों कि रेखाओं पर जाकर टिक जाती हैं
और
ढूँढ़ने लगती है उन रेखाओं के बीच फँसे
मेरे मुक़्कदर को ...

सुना है रेखाएँ भाग्य की
प्रतिबिम्ब होती हैं
जिसमें छुपा होता है हर एक का कल
कल किसने देखा है
आज ज़िंदा रहूँगा तो कल देखूँगा ना?

अगर बच गया तो,
फिर से सारे शब्द, नियति, संयम, परिताड़नाएँ
रचने लगेगे अपने अपने चक्रव्यूह
मुझे घेरने का...!

इससे अच्छा तो मैं
अपनी हथेलियों को बंद कर दूँ
ना बजेगी बाँस, ना बजेगी बाँसुरी
आज पसर के सो जाता हूँ
कल की कल देखेंगे
नियति से कल निपट लेंगे..!


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