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| 08.30.2007 |
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अनहोनी पाराशर गौड़ |
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3
कान्ति ने
रजनीश से कहा ...
"सबके
लिये तो ले लिये,
बस
एक गुड़िया रुची के लिए लेकर चलते है।"
रजनीश ने
कहा... "ठीक है लेकिन जरा जल्दी कीजिये बहुत देर हो गई है। वे सब कह रही
होंगी कि मम्मी पापा जाने कहाँ गायब हो गये।"
जैसे ही
वे घर की गली के पास पहँचे तो देखा गली बन्द। पुलिस वाला ट्रैफिक को दूसरी
गली की ओर इशारा करके उन्हे उधर से जाने को कह रहा था। पहले तो उन्होंने
सोचा कि शायद कोई "ब्रेकइन" हुई होगी। इसीलिए शायद गली बंद है,
कान्ति ने रजनीश से पूछा ..."क्यों हुई होगी हमारी गली बंद?"
"मालूम
नहीं ... लेकिन फ़ॉर
श्योर...... कुछ ना कुछ तो अवश्य हुआ है।"
कान्ति
बोली,
"रुको,
मैं पता करती हूँ कि क्या बात है।"
गाड़ी से उतर कर जैसे वह पुलिस के पास पहुँची उसने उससे पूछा...
"आफिसर ये गली क्यों बंद है ..."
"...... 55
में किसी को गोली लगी है।" उस आफिसर ने दो टूक में जबाब दिया।
"...क्या
कहा...?"
"55
नम्बर में किसीको गोली लगी है मैडम।"
पुलिस का उत्तर सुन कर कान्ति का मन जोर जोर से धड़कने लगा। सोचने
लगी कि कहीं मनजीत को तो कहीं किसने...... उसने रजनीश की ओर देखा। रजनीश
उसका इस तरह से देखने अभिप्राय नहीं समझ पा रहा था कि क्यों कान्ति उसे
घबराई घबराई नजरों से देख रही है। वह पुलिस को धक्का देकर आगे जाने के
प्रयास में पुलिस से उलझने लगी।
"...आप
आगे नहीं जा सकते।" पुलिस ने
रोकते हुए कहा।
इतने में
रजनीश भी वहाँ पहुँच गया। उसने पुलिस से रोकने का कारण पूछा तो पुलिस ने
कहा...
"55
में किसी को गोली लगी है।"
"...वो
हमारा ही घर है। सब ठीक तो है।" रजनीश ने कान्ति को अपनी बाँहों में लेते
हुए कहा।
"
खबर ठीक
नहीं है।"
"...क्या
मतलब......?"
कान्ति ने रजनीश की ओर देखते हुए पुलिस से प्रश्न किया।
"वैसे
बच्ची को हस्पताल लेकर गये है लेकिन......"
"लेकिन
क्या ......?"
घबराई कान्ति ने पूछा।
"बचने
की कोई उम्मीद नहीं है। खून बहुत निकल चुका है।
"इतने
में कला ने रोते रोते माँ के पास आकर उसके सीने से लिपट कर रोते हुए उससे
कहा "......मम्मी रुची को
...।"
"...किसने
मारी मेरी मासूम सी बच्ची को गोली।" कला को छाती से चिपकाते हुए कान्ति फफक
पड़ी।
"मोनिका
ने.........।"
इतना
सुनना था कि कान्ति बेहोश होकर रजनीश के हाथों में झूल गई। पुलिस व रजनीश
उसके चेहरे पर पानी के छींटे दे देकर उसे होश में लाने का प्रयास करने में
लग गये। थोड़ा होश आने पर उसे घर पहुँचा दिया गया।
रजनीश ऊपर गया
देखा मोनिका कमरे के कोने में डर के मारे दुबकी पड़ी है। उसके पास जाकर
जैसे ही उसने उसके सर पर हाथ रखा। मोनिका जोर जोर से कहने लगी "...... नहीं
पापा मैने नहीं मारा रुची को ...।"
गोद में लेते
हुए रजनीश ने कहा... "मैं जानता हूँ ...जानता हूँ... तुमने जान बूझकर नहीं
मारा। जो होना था सो हो गया लेकिन ये बता कि तुझे कहाँ से मिली थी वो
पिस्तौल?"
"......भाई
के कमरे में बिस्तर के नीचे से......" कहते कहते पापा से लिपट कर रोने लगी
थी मोनिका। वो उसे चुप करने के प्रयास में था कि इतने में फोन की घंटी बज
उठी। उसने फोन उठाया......"हलो...।" मनजीत ने आवाज पहिचान ली थी-
"...
पापा... मम्मी से बात कर सकता हूँ
?"
"उनकी
तबियत बहुत खराब है।"
"क्यों
क्या हुआ मम्मी को?"
"खुद
आकर देख लो।" खट से फ़ोन रख दिया था रजनीश ने।
मनजीत
जैसे घर पर आया तो देखा चारों ओर पुलिस ही पुलिस। जैसे ही वे अंदर जाने लगा
पुलिस ने टोका ...
"तुम्हारा
नाम?"
"...मनजीत
...।"
उसे
पकड़ते हुए पुलीस ने कहा,
"यू
आर अन्डर अरेस्ट ...। तुम्हें हत्या के जु्र्म में गिरफ़्तार किया जाता
है।"
"लेकिन
मैंने तो किसी का खून किया ही नहीं ...।"
"तुम्हारी
गन से तुम्हारी छोटी बहिन का कत्ल हो गया है।"
"ओ
माई गाड...... यह क्या हो गया!" कहते कहते वो रोने लग गया। इतने में रजनीश
उसके पास आकर कहने लगा,
"मनजीत...
मैंने और तुम्हारी मम्मी ने
तुम पे न जाने कितने सपने बुने थे। तुमने उन सब को तार-तार करके रख दिया।
जानते हो... इनके टूटने के
पीछे कौन और किसका हाथ है.. तुम्हारा। तुम्हारी इस पिस्तौल से एक
नहीं कइयों की मौत हो गई
बेटा। रुची मरी तुम्हारी गन की गोली से। माँ मर रही है तुम्हारी इन करतूतों
से। कला को तो जैस साँप सूँघ गया हो। मोनिका तो इतनी डर गई है कि बात बात
पर बेहोश हो रही है। रहा मै... मै चल फिर जरूर रहा हूँ लेकिन अन्दर से अपने
को बहूत टूटा टूटा नहसूस कर रहा हूँ।"
"रुची
गई...तुम भी कम से कम
10-12
साल के लिए तो गये ही समझो। तुम्हारी एक छोटी सी नादानी ने पूरे घर की
बुनियाद हिला कर रख दी। क्या मिला हमे यहाँ आ कर। सब कुछ खत्म हो गया!"
कान्ति
अपने विचारों में खोई हुई थी कि एक आवाज गूँज उठी ..."ऑल राईज...-"
सुन कर कान्ति की तन्द्रा टूटी। उसके अगल बगल के सब लोग उठकर खड़े
हो गये थे उसे भी कला व रजनीश ने सहारा देकर खड़ा किया,
क्योंकि जज अपनी सीट पर बैठ चुका था।
थोड़ी देर
में एक-एक करके मुलजिमों को ला कर जज के सामने प्ोश किया जाने लगा। काफी
देर के बाद मनजीत कमरे में दाखिल हुआ। बाल बिखरे हुए,
दाढ़ी बढ़ी हुई। ये देख कर कान्ति के आँखों के आँसू थमने का नाम ही नहीं ले
रहे थे। दोनों,
पक्ष विपक्ष की जिरह सुनने के बाद जज ने अपना फैसला सुनाया......
"हालातों
और सबूतों को ध्यान में रखते हुए अदालत इस नतीजे पर पहुँची है कि यद्यपि
मुलजिम मनजीत का मृतक की मौत में सीधा हाथ नहीं है,
लेकिन उसकी गन जो कि फ़ायर एक्ट के तहत रजिस्टर भी नहीं है,
जो
कि कानूनी जुर्म है। चूँकि उससे चली गोली चलने से एस मासूम की जान गई इसलिए
मुल्जिम कसूरवार है... कानून उसकी उम्र को ध्यान में रखते हुए उसे
5
साल की सजा सुनाती है।" इसके साथ ही जज ने हथौड़े को मारते हुए ये ऐलान
किया।
जैसे
हथोड़ा बजा कान्ति को लगा यह आवाज वहाँ नहीं,
बल्कि जज ने उसके हृदय पर
मारी हो। सब जज को चैंबर से बाहर जाते देखते रहे। मनजीत कटघरे में अपने
जाने की प्रतीक्षा में सर झुकाये खड़ा था।
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