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08.30.2007
 
अनहोनी
पाराशर गौड़

2

उस दिन कान्ति जल्दी उठ गई थी। नाश्ता पानी  घर की साफ-सफाई चौका चुल्हा करके वो रजनीश से बोली ...

"...अज्जी सुनते हो...कुछ गिफ्‍़ट रह गये हैं। आप तयार हो जाइये, शापिंग करने जाना है..."

"हम तैयार हैं।"  रजनीश ने पलट कर कहा। थोड़ी देर में कान्ति नीचे आकर गिफ्‍़ट की लिस्ट को उठाते हुये बोली...चलिए...

जाने से पूर्व कान्ति ने कला को आवाज दी ..., "कला बेटे..."

अन्दर से आवाज आई ..."जी मम्मी......"

"बेटा हम  बाहर जा रहे हैं, घर का ख्याल रखाना...और हाँ...... मोनिका और रुची उठ जायें तो उन्हे नाश्ता करवा देना।"

"...जी मम्मी।"

"उन्हें बाहर मत जाने देना।"

"...जी मम्मी।" दोनों गाड़ी में बैठकर डाउन टाउन की ओर चल दिये शापिंग के लिए।

मोनिका रुची उठ चुकी थी। कला ने उन्हे नाश्ता करवा दिया था। तीनों टी. वी. देख रही थीं कि अचानक मोनिका ने कला से पूछा,  "...दीदी मैं और रुची ऊपर खेलें।"

"...हाँ......हाँ  खेलो लेकिन चीजें इधर उधर मत फेंकना, वरना मम्मी मारेगी।"

"नहीं हम नहीं फेंकेगे ......" दोनों  ने एक साथ कहा और कहते ही ऊपर की मंजिल की ओर दौड़ पड़ीं। कला टी वी देखने में मस्त हो गई और वो दोनों ऊपर के कमरे में  एक दूसरे के ऊपर तकिया फेंकने में लग गईं। जाने कब टी वी देखते देखते कला की आँख लग गई वो सोफे में लुढ़क गई।

ऊपर दोनों कमरों-कमरों  में घुस-घुस कर हाईड और सीक खेल रहे थे। खेलते-खेलते मोनिका मनजीत के कमरे में घुस गई। वहाँ उसने उसके बिस्तर का गद्दा उठाया। ज्यों ही वे उसके अदंर घुसने जा रही थी, उसे एक पिस्तौल पड़ी दिखाई दी। मोनिका ने रुची को आवाज़ दी... "रुची ..."

रुची भाग कर मनजीत के कमरे की ओर लपकी। मोनिका के हाथ में पिस्तौल को देखकर उसने उससे पूछा......

"ये क्या है दीदी......"

"ये...ये बंदूक है बंदूक।" उसने रुची से कहा..."सुन अब हम चोर सिपाही का खेल खेलेंगे  क्यों?"

 

रुची बोली... "लेकिन सिपाही मैं बनूँगी।"

"नहीं मैं बनूँगी......",  मोनिका ने रौब से कहा, "सिपाही बड़ा होता है और चोर छोटा। तू छोटी है इसलिए तू चोर बनेगी।"

तुनक कर रुची बोली..."तू हमेशा बड़े होने क्यों रौब जताती रहती है?"

"...क्योंकि मै बड़ी हूँ इसलिए... चल तैयार हो जा ...।"

सुनकर जैसे रुची जाने लगी पीछे से मोनिका ने कहा...

"...अररर सुन... तू भागेगी तो मैं कहूँगी रुक ...रुक... रुकजा वरना गोली मार दूँगी, तू ना एक बार मुझे देखियो और फिर भाग जाइयो ...ठीक है ना।"

रुची ने सिर हिलाकर उसका समर्थन किया।

दोनों कमरे कमरों व लाबी में भाग भागकर ऊधम चौकड़ी मचा रहे थे। रुची जैसे ही कमरे से बाहर लाबी में आई पीछे से मोनिका ने पिस्तौल का निशान रुची पर साधते हुए कहा... "रुक जा ...मै कहती हूँ... रुकजा  वरना गोली मार दूँगी। रुची पलभर के लिए रुकी। उसकी ओर मुड़ी। अपनी निश्छल हँसी को हँसते हुए मुड़ कर भागी। इतने में मोनिका फिर कहा ... "रुकजा... वरना गोली मार दूँगी।"

रुची मुशकिल से 10 कदम भी नही दौड़ी थी कि धड़ाम की आवाज के साथ गोली निकल कर सीधे रुची की पीठ को भेदती हुई सामने की दीवार में जा धंसी। रुची को गोली लगते ही, वो धड़ाम से फर्श पर गिर गई। पीठ से खून का फुब्बारा फूट कर बहने लगा, जिसे देखकर मोनिका हतप्रभ रह गई।

गोली चलने के धमाके की आवाज से कला एकाएक चौंककर उठ बैठी। इधर ऊधर देखकर उसने मोनिका और रुची को आवाजें लगाई.. " ...मोनिका...... रुची..."  दो तीन बार आवाज लगाने बाद भी जब कोई जबाब नहीं मिला तो वो भागकर ऊपर की ओर लपकी। जो कुछ उसने  वहाँ जाकर देखा। उसे देखकर उसके पाँव के नीचे की जमीन खिसक गई। रुची...   औंधे मुँह जमीन पर गिरी खून के तालाब में सनी पड़ी थी। दूसरी ओर एक कोने में अपने घुटनों के बीच में डरके मारे अपना सर छुपाये मोनिका डर के मारे थरथर काँप रही थी। पास में पड़ा था वो पिस्तौल जिससे गोली चली थी। कला को स्थिति समझते देर नहीं लगी।

 

"...हे भगवान...... ये क्या हो गया। मै मम्मी को क्या कहूँगी। क्या जबाब दूँगी मैं उन्हें?" उसे कुछ नही सूझ रहा था। हिम्मत करके उसने पुलिस को फ़ोन किया ...... " ".........हलो,  पुलिस...। जी...मै  हाऊस नम्बर 55 ग्रीन ड्राइव, स्कारबोरो से बोल रही हूँ जल्दी आइये मेरी छोटी बहिन को गोली लग गई है प्लीज़ ......हरी.........। "

चन्द मिनट में पुलिस आ पहुँची। आते ही उन्होने सारी सड़क को सील कर दिया। पुलिस रुची को लेकर पास के हस्पताल चली गई। कुछ पुलिस वाले कला व मोनिका से घटना के बारे में पूछकर सूत्रों को इकट्‍ठा करने में जुट हुई थी। 

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