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08.30.2007
 
अनहोनी
पाराशर गौड़

1

 

मिसेज कान्ति बत्रा अपने पति व दो बेटियों कला व मोनिका के साथ न्यू कोर्ट के कमरा नंबर 326 में अपने 20 साल के बेटे मनजीत के पेश होने का इन्तजार कर रही थी। मनजीत पर "बिना रजिस्ट्रड फायर आर्म" रखने व एक मासूम की हत्या का आरोप लगा हुआ था।

कमरा खचाखच भरा हुआ था। कान्ति के साथ और भी कई लोग अपने अपने चाहने वालो के केस के लिए वहाँ पर आये हुए थे। सबके सब जज के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। बेंच पर बैठी कान्ति पथराई निगाहों से जज की खाली कुर्सी को एक टक होकर निहार रही थी। सोचने लगी कि ये क्या हो गया। उसकी वर्षों की मेहनत से बना बनाया घर पल में ही उसके आँखो के सामने टूटकर चूरचूर हो गया।  मनजीत के कोर्ट सज्जा के बारे में सोचते सोचते वो घटित पूरी घटना एक फिल्म की तरह उसके मानस पटल पर रेंगने लगी।

आज से 30 साल पहले ठीक आज के ही दिन जब वो और रजनीश भारत से कैनडा आ रहे थे तब कितनी उमंग और जोश था दोनों में एक नई जगह आने के लिए। एक नई ज़िन्दगी की शुरूआत के लिए।

कैनडा आने पर जैसा सोचा था वैसा हुआ नहीं। शुरू शुरू में तो कई बार दोनों ने वापस जाने का भी मन बना लिया था। रात दिन कड़ी मेहनत करके कुछ दिनों के बाद उन्होनें अपने पैर जमा लिये। इस दौरान कान्ति माँ बन गयी। मनजीत उनके जीवन में नई रोशनी व ढेर सारी उम्मीदों को लेकर आया था। पूरा घर उसकी किलकारियों से गूँज उठा। मनजीत को गोदी में लेकर कान्ति रजनीश से बोली ...

 "मै तो इसे वकील बनाऊँगी ..."

"...अच्छा..." हँसते हुए रजनीश ने कहा।

फिर शरारती भाव में उसने कान्ति से कहा... , " इसे तो आप वकील बनाओगी माना  और जो बाद में आयेंगे उन्हें क्या बनायेगी?"

फटाक से बिना देर किये कान्ति ने उत्तर दिया ... " एक को डाक्टर दूसरे को इंजिनियर और तीसरे को ..." वो कुछ कहती उसकी बात को बीच में ही काटते हुए रजनीश बोल पडा...... "अरे बस भी करो भाई.........फुटबाल की टीम बनानी है क्या?" ये सुन कर दोनों खिल खिलाकर हँस दिये।

कुछ समय के बाद कान्ति ने अपने माँ बाप भाई बहिनों को बुला लिया जो उसके कामों में हाथ बँटाते रहे। समय गुजरता चला गया। बदलते समय की धारा के साथ साथ उनका जीवन की धारा में भी बदलाव आया। मनजीत के बाद कला, मोनिका व रुची ने उनके जीवन में आकर और भी खुशहाली भर दी।

रुची आज 5 साल की हो गई थी, मोनिका 8 की, कला 15 की और मनजीत 20 का। रुची के जन्म दिन पर ढेर सारे उपहार देने के बाद कान्ति भगवान का धन्यवाद देना नहीं भूली।

"...प्रभो आपकी बड़ी अनुकम्पा रही मेरे और मेरे परिवार पर। मैंने जो चाहा आपने दिया। हम आपके ऋणी है। बस... अब इतनी और कृपा करना प्रभो कि ये पढ़ लिखकर अच्छी नौकरीयों पर लग जायें, खासकर मनजीत... मनजीत पर अपना हाथ ज़रूर रखना ...प्रभो।"

मनजीत यूँ तो पढ़ाई में होशियार था, लेकिन लड़ाई झगड़ों में भी पीछे न रहने कारण माँ बाप को हमेशा एक डर सताता रहता था कि कहीं बेकार के लफड़ों में फंस कर अपनी पढ़ाई चौपट न करदे। कला उसके ठीक विपरीत थी। वो घर पर मम्मी का घर के कामकाजों में हाथ बँटाती। अपने छोटी बहिनों को देखती। उनकी बेबी सिटिंग करती। स्कूल में औरों के लिए वो एक रोल माडल थी। सबकी मदद करना उसकी कमजोरी थी। स्कूल में टीचर उसे "मदर ट्रीसा" कह कर पुकारते थे।

समय का फेर क्या दिन दिखाये ये कोई नही जानता। कान्ति के हरे भरे परिवार पर भी एक दिन समय की ऐसी गाज गिरी कि उसके परिवार की नींव हिलकर रह गई।

क्रिसमिस के उपलक्ष्य पर सारा शहर अपने अपने अनुसार अपने परिवार के सदस्यों व इष्ट मित्रों के लिए उपहारो की खरीदो फरोख़्‍त में लगा हुआ था, तो कोई घरों की सजावटों में।

कान्ति भी हर साल की तरह इस बार भी व्यस्त थी। वो ताहेफ़ों की लिस्ट को देखकर काट-छाँट करके जो बच गया था उसको अलग पेपर पर लिखकर, कल की शापिंग की लिस्ट में शामिल करने में लगी हुई थी। उसे क्या पता था कि आने वाला दिन उसके लिए एक दर्दनाक तोहफ़ा लेकर आ रहा है जो उसे हमेशा के लिए बदल देगा। उस मनहूस दिन को याद करके उसकी आँखों से आँसूओं की धारा बहने लगी।

कला ने मम्मी की आँखों से उमड़ते आँसुओं के सेलाब को देखा तो आहिस्ते से मम्मी का हाथ अपने हाथों में लेकर धीरे से सहलाया। आँसू पोंछे और कहा "...ममा रोयें मत। सब ठीक हो जायेगा।"

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