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08.25.2007
 
 अधूरे सपने
पाराशर गौड़

 3

 

रोज़ की तरह रोज़ी तैयार होकर स्कूल को चल दी। वो डैनियल पर नाराज़ थी। नाराज़... बहुत नाराज़। जिसने उसे ऐसे अवसर पर धोखा दिया जब वो पहली बार उसके साथ मिलकर कोई निर्णय लेना चाहती थी। रास्ते में चलते-चलते वो अपने से बातें करती जा रही थी - "चाहे कुछ भी हो जाय आज मैं उस से नहीं बोलूँगी। चाहे वो कितना भी गिड़गिड़ाये  कितनी विनती करे, चाहे कितनी भी कसमें खा ले... मैं पिघलने वाली नहीं...क्या समझता है वो अपने आप को।"

इतने में स्कूल आ गया। अपनी कक्षा में दाखिल होते ही उसे डैनियल दिखाई दिया। पल भर के लिए दोनों की निगाहें टकराईं। जितनी तेज़ी से निगाहें मिली थीं, रोज़ी ने उतनी ही तेज़ी से अपनी निगाहें पीछे हटा लीं। डैनियल को समझते देर नहीं लगी कि रोज़ी के गुस्से का पारा ज्यादा ही गर्म है।

पीरियड खत्म होते ही दोनों अपने लॉकरों की ओर चल दिये। डैनियल ने रोज़ी के पास जाकर कहा- "हाय,... हैप्पी बर्थ डे।"

रोज़ी ने जैसे ही सुना उसकी तरफ से अपना चेहरा दूसरी ओर मोड़ लिया और ऐसी अभिनय करने लगी जैसे उसने सुना ही नहीं हो।

"नाराज़ हो। वैसे तुम्हारा नाराज़ होना बनता भी है। क्योंकि मैं वहाँ से चला जो गया था।" रोज़ी की बाँह पकड़कर उसे अपनी ओर करते हुए डैनियल ने कहा- "हे......लुक ऐट मी ...पूछोगी नहीं कि क्य़ूँ गया था वहाँ से मैं।"

"हाँ क्य़ूँ गये थे। बोलो...... क्य़ूँ गये थे।" झटके से गुस्से में हाथ को छुड़ाते हुए उसने कहा।

"समझाता हूँ... समझाता हूँ... पहले यहाँ से बाहर तो चलो।"

"नहीं......, मुझे नहीं जाना ...।" तुनक कर रोज़ी बोली।

"अर...र...रै चलो भी......।" उसने रोज़ी की बाँह पकड़ी और उसे घसीटते हुए सामने रैस्ट्रोरेन्ट की ओर ले गया। बिठाते हुए बोला- "देखो  रोज़ी मैं नहीं चाहता था कि तुम्हारे जन्मदिन के मौके पर मुझे लेकर कोई लफड़ा हो। तुम्हें बे वज़ह बुरा भला सुनना पड़े वो भी मेरी वज़ह से... देखो..."

बीच में उसकी बात को काटते हुए रोज़ी बोल उठी- "देखो...देखो  ...... क्या देखो! सब धरा का धरा रह गया। अपने 18वें जन्मदिन पर जब मैं सब के सामने कोई निर्णय लेना चाह रही थी तो तुम कायरों की तरह वहाँ से भाग गये।"

"आई एम सॉरी...... रियली सो सॉरी। रोज़ी... तुम मुझे कायर कह लो, डरपोक कह लो,  जो भी जी में आये वो कह लो।  लेकिन कहने से पहले थे गिफ़्‍ट तो देख लो, प्लीज़।" गिफ़्‍ट  को उसकी ओर बढ़ाते हुए उसने कहा।

रोज़ी ने गिफ़्‍ट को खोलकर ज्यों देखा.. मारे खुशी के डैनियल से चिपकते हुए उसने कहा- "हाउ स्वीट...... थैंक्स।" गाल पर चुबंन लेते हुए उसने कहा- "आई लव यू......!"

"मी टू......!" कह कर दोनों पल भर के लिए एक दूजे के बहुपाश में बंध गये। थोड़ी देर वहाँ बैठकर अपने गिले शिकवे मिटाने के बाद दोनों घर की ओर चल दिये।

रोज़ी डैनियल से मिलने के बाद बहुत खुश थी। हाथों में उसके गिफ़्‍ट को लेकर खुशी में गुनगुनाते जैसे वो घर में घुसी... माँ ने उसे पूछा- "क्या बात है आज बहुत खुश नज़र आ रही है हमारी बिiटया रानी और ये हाथ में क्या है?"

"गिफ़्‍ट...!"

"किसने दिया?"

"डैनियल ने ...!"

"ये डैनियल का क्या चक्कर है बेटे?" - मधु ने जानना चाहा।

"मम्मी... वो मेरा बहुत अच्छा मित्र है ... ही लव्ज़ मी एण्ड आई लव हिम टू...!" कह कर सीढ़ियों की ओर लपकी।

"ये लव-सव का चक्कर छोड़। पहले पढ़ाई पर ध्यान दे।" मधु ने समझाते हुए रोज़ी से कहा- "देख बेटे,  ये सब बातें अगर तेरे पापा सुनेंगे तो बहुत गुस्सा होंगे। उनको तेरी इन करतूतों का पता चल गया तो क्या कहेंगे?"

रोज़ी अभी सीढ़ियों के बीच में पहुँची थी कि उसने मुड़ कर मधु से कहा- "ज़्यादा से ज़्यादा डाँटेंगे और क्या... हाथ तो लगा नहीं सकते। ज़्यादा तंग करेंगे तो घर छोड़ कर चली जाऊँगी।" कह कर कमरे में घुस गई।

"ये कैसी बात कर रही है तू।" जब तक और कुछ कहती तब तक भड़ाक से दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ ने उसे वहीं रोक दिया। सर पकड़ कर बैठ गई थी मधु।

दूसरे दिन रोज़ी जैसे स्कूल पहुँची उसने डैनियल से कहा-

"डैनियल... आज मैंने मम्मी को अपने इरादों की भनक दे दी है।"

"इरादे... कौन से इरादे? मैं तुम्हारे कहने का अर्थ नहीं समझा।" -डैनियल पूछा।

"यही कि मैं तुमसे प्यार करती हूँ और मैं अपने प्यार के लिए कुछ भी कर सकती हूँ। यहाँ तक कि अगर मुझे घर भी छोड़ना पड़े तो मैं छोड़ दूँगी।"

रोज़ी के कहे शब्द "इरादों की भनक" ने डैनियल को सोचने पर मजबूर कर दिया था।  यूँ तो वो भी कच्ची उम्र में उठते प्रेम की रौ में रोज़ी के साथ बह तो ज़रूर रहा था। इस उम्र में प्रेम में पागल होना और उसमें अन्धे होने का नतीजा क्या होता है यह उससे बेहतर कोई नहीं समझ सकता था क्यों कि उसकी माँ ने भी ऐसी ही गलती की थी। वो भी किसीके प्यार में अन्धी होकर अपने माँ-बाप, भाई-बहिन सबको दर-किनारा कर उसके साथ भाग गई थी, जिसने कुछ दिन साथ रहने के बाद उसके गर्भ में अपनी निशानी देकर उसे बीच रास्ते में अकेला छोड़, उसके जीवन से जाने कहाँ गायब हो गया था। डैनियल को उसकी माँ ने न जाने कितनी मुसीबतें झेलते हुए पाला था। कच्ची उम्र में, प्रेम में अन्धे होकर निर्णय लेने का अर्थ डैनियल ने बचपन से ही न केवल देखा था बल्कि उसे जीया भी था। अब रोज़ी के मुँह से वैसी ही बातें सुनकर वह विस्मित रह गया था और अपने आप से प्रश्न कर रहा था कि क्या वह भी रोज़ी के साथ वही गलती करेगा जो उसके माँ बाप ने की थी। उसने अपने मन ही मन दृढ़ता से निर्णय लिया और  उसने रोज़ी से कहा- "रोज़ी सुनो ...तुम मुझे प्यार करती हो...?"

"हाँ...।"

"तो कसम खाओ कि तुम आज के बाद कभी भी घर छोड़ने की बात अपने दिमाग में नहीं लाओगी। मैं तुम्हें नफ़रत से नहीं प्यार से उस घर से अपने घर लाने की सोचता हूँ। तुम घर से भाग कर शादी इसलिए करोगी कि तुम और मैं खुश रहें और हमारे किये गये कामों से दोनों परिवार दुश्मनी और नफ़रत की आग में जलते रहें। ऐसा  करके मैं तो खुश नहीं रह सकता...तुम रह पाओगी ... बोलो.....?"

यह सुनकर रोज़ी का चेहरा लटक गया। वो सर नीचे कर पाँव के अंगूठे से ज़मीन खुर्चने लगी। उसने रोज़ी को उठाया अपने बहुपाश में कसते हुए कहा- "ऐसा कभी भी मत सोचना माई लव!"

तभी स्कूल की घन्टी बजी दोनों क्लास की ओर चल दिये।

जब भी गोपी मधु को रोज़ी के बारे में पूछता वो उसे यह आश्वासन देकर टाल देती कि मैं सब संभाल लूँगी। आप कुछ ना बोलें। इस दौरान रोज़ी ने ऐसी कोई हरकत नहीं की जिससे घर में कोई कोहराम मचता। उसके इस बदलाव पर भी उन दोनों को शक सा होने लगा था कि क्या बात है कि रोज़ी ठीक समय पर स्कूल जाती है और ठीक समय पर घर लौट आती है।

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