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08.25.2007
 
अधूरे सपने
पाराशर गौड़

2

 

 

        अंधेरा छाने लगा था। कमरे में रोशनी जगमगा रही थी। बैठक वाले कमरे में लाल पीले नीले कागज़ की लम्बी कतरन बाली पट्टिओं से कमरा सजा हुआ था, जिसमें गुबारे चिपाकाये हुए थे। वे पंखे की हवा में उड़ उड़ कर नीचे आने को आतुर हो रहे थे। कमरे के बीचों-बीच में एक टेबल थी। उसमें सफेद चादर बिछी हुई थी।  जिसमें रखा हुआ था एक केक। उस केक पर बड़े आर्टिस्टिक अक्षरों में लिखा था, "हैप्पी बर्थ डे टू रोज़ी।"

रोज़ी की सहेलियाँ और गोपी एवं मधु केक के चारों ओर खड़े थे। रोज़ी हाथों में केक काटने का चाकू लिये बार बार बाहर की ओर देखे जा रही थी। तभी मधु ने रोज़ी से कहा –

केक काटो बेटा...।"

"हाँ ..., अभी काटती हूँ मम्मी...।" कह कर फिर बाहर की ओर देखने लगी।

"क्या बात है बेटे ?" मधु ने फिर रोज़ी से पूछा .. "किसी का इन्तजार है क्या?"

"हाँ... ।"

"चल तू पहले केक काट ले। वो जो भी है देर सबेर पहुँच ही जायेगा।" मधु ने उसे चाकू को पकड़ाते हुए केक काटने के लिए फिर कहा। इधर उधर देखने के बाद रोज़ी ने केक काट दिया। गोपी ने एक टुकड़ा उठाकर उसके मुँह में डालते कहा - "जन्म दिन मुबारक हो बेटे!"

"थैंक्स डैड....।"

रोज़ी के माथे को चूमते मधु ने कहा- "जन्म दिन बहुत बहुत मुबारक हो बेटे।" उसके मुँह में केक का टुकड़ा डालते हुए और साथ में गोपी की ओर देखते हुए उसने कहा- "बच्चे कितने भी बड़े क्यों ना हो जायें लेकिन माँ-बाप के लिए वे हमेशा बच्चे ही रहते हैं।"

इतना कहना था कि रोज़ी बीच में बोल उठी - "पर मैं अब बच्ची नहीं हूँ मम्मी... अब मैं बड़ी हो गई हूँ। आज के बाद मैं अपने निर्णय स्वयं ले सकती हूँ...... क्यों डैड?"

इस प्रकार के उत्तर को सुनकर पहले तो गोपी सन्न रह गया। सोचता रहा कि अगर वो इस समय भारत में होता और रोज़ी ने ये बात वहाँ कही होती तो दो थप्पड़ उसके गाल पर मारकर उसको उसकी इस बदत्तमीज़ी का उत्तर देता लेकिन क्या करे इस देश में तो उसके हाथ कानून के दायरे से बँधे हुए हैं। केवल हाँ में हाँ मिलाने के सिवा कुछ नहीं कर सकता। उसने ने मधु की ओर देखते हुए कहा - "हाँ...हाँ... क्यों नहीं क्यों नहीं बेटे।"

पापा की इस स्वीकृति को पाकर उसे लगा कि वास्तव में 18 साल पूरे होने का क्या अर्थ होता है। उसे लगा कि आज उसका भी अपना कोई वजूद है। लगा रहा था कि जैसे उसके हाथ में राजसत्ता आ गई हो। अब वो जो चाहे कर सकती है। अब उसे मम्मी पापा से हर बात में इजाज़त लेने के लिए गिड़गिड़ाना नहीं पड़ेगा और ना ही मिन्नते करनी पड़ेंगी। आज उसे लगने लगा कि वह अब अकेले ही पूरे समाज से लड़ सकती है। उसे बदल सकती है।

पापा के हाँ सुनने के बाद उसने कहा - "तो पापा सबसे पहले मैं आज आपसे अपने दोस्त को मिलाना चाहती हूँ। आप यहीं ठहरिये मैं उसे लेकर अभी आती हूँ।" - कहने के साथ ही वो बाहर गेट की ओर लपकी। ये सुनकर वे  दोनों एक दूसरे का चेहरा देखने लगे।

रोज़ी ने इधर उधर झाँका। डैनियल को ढूँढने प्रयास किया लेकिन डैनियल का कहीं पता न था। थोड़ी देर में मुँह लटकाये अंदर आकर बड़े मायूसी और रुआँसे शब्दों के साथ उसने बुदबुदा कर कहना शुरू किया...

"वो चला गया...।"

"वो कौन...? किसकी बात कर रही है तू ......? कौन चला गया?" गोपी ने रोज़ी से पूछा।

"मेरे स्कूल का दोस्त।"

"दोस्त... कौन सा दोस्त ...?"

"डैनियल ... ।" कहने के साथ ही भाग कर ऊपर अपने कमरे में चली गई। उसकी सहेलियाँ गोपी और मधु मुँह लटकाये सब एक दूसरे को देखते रह गये।

"आंटी हम चलते हैं...  हम लोग कल रोज़ी से स्कूल में उसे मिल लेंगे।" कह कर वे सब अपने अपने घरों की ओर को चल दीं।

सोफे के एक कोने में गोपी तो दूसरे कोने में मधु पिटे हुए मोहरों की तरह चुपाचप बैठे हुए थे। मौन को तोड़ते हुए गोपी ने पूछा - "ये सब कब से चल रहा है।"

"मुझे क्या पता?" मधु ने उत्तर दिया- "मैं भी तो आप के ही साथ 5 बजे घर से निकल जाती हूँ। सूरज ढलने के बाद वापस लौटती हूँ। बचा खुचा समय घर की साफ-सफाई, चौका-चूल्हा, खाना बनाने में बीत जाता है। मुझे खुद अपने अगल-बगल में झाँकने का समय तक नहीं मिलता। चक्की की तरह पिसती रहती हूँ।"

"तुम माँ हो... तुम्हे पता होना चाहिए कि इस घर में क्या हो रहा है।"

"समझती हूँ ...समझती हूँ। थोड़ा संयम से काम लेना होगा। सब ठीक हो जायेगा। आप चिन्ता ना करें। अब वो बच्ची नहीं रही जवान हो गई है। थोड़ा धीरे बोलें।"

"हाँ ... जवान हो गई है। सुना नहीं कैसा जबाब दिया था तुम्हें उसने...। मन तो कर रहा था थप्पड़ से चेहरा बिगाड़ दूँ...-" गुस्से में उबलते हुए गोपी ने कहा –

"रहा जवानी का भूत तो निकालने में एक मिनट नहीं लगेगा मुझे। वैसे ये सब तुम्हारा कसूर है। तुम्हारे लाड़-प्यार ने बिगाड़ है उसे।"

"अर...ररे...... गुस्सा छोड़िये भी... कहा ना सब ठीक हो जयेगा। बच्ची है अभी। समझा दूँगी उसे बस...। चलिए आराम कीजिए।" - कह कर वे सोने चले गये।

दोनों सोने की कोशिश कर ज़रूर रहे थे लेकिन आँखों से नींद गायब थी। कल रात के घटनाचक्र ने उन दोनों की नींद गायब कर दी थी। सारी रात वो करवटें बदलते रहे। रोज़ी और डैनियल के रिश्तों को लेकर वे  जाने क्या-क्या सोचते रहे। इस सोच को सोचते-सोचते मधु का सर दर्द के मारे फटा जा रहा था। वो उठी। उसने घड़ी की ओर देखा। सुबह के ढाई बज रहे थे। तकिये के नीचे से अपनी सर की चुन्नी को निकाल कर वह माथे पर कसके बाँधने के साथ लाइट जलाते हुए सरदर्द की गोली ढूँढने लगी।

"क्या ढूँढ रही हो...?" गोपी ने करवट बदलते हुए मधु से पूछा।

"सर दर्द की गोली।"

"इधर है मेंरे पास ... ये लो।"

गोली को पानी के घूँट के साथ निगलने के बाद वो गोपी से बोली –

"आप सोये नहीं ...?"

"तुम सोई हो क्या?"

"नहीं।" कहते-कहते मधु फिर बिस्तर में लुढ़क गई।

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