जिस दिन मैंने अपन पैत्रिक घर से विदेश के लिए पाँव रखा था मुझे... तभी लगने लगा था कि ये अब वापस नहीं लौटेंगे...
ये देश जिसमें मैं आकर बस गया हूँ इसने मुझे मेरे साथ साथ मेरी पीढ़ी, मेरे समुचे राष्ट्र को भी निगल लिया है।
और अब मैं... अपनी पहचान के लिए छटपटा रहा हूँ कि मैं कौन था कहाँ से आया हूँ।