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01.05.2009
 
 जब भगवान ने भारत से चुनाव लड़ा
पाराशर गौड़

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भगवान इन दिनों, नारद जी द्वारा मार्किट से लाई गई फिल्मी एक्टरों की टेपों को देख देख कर अभ्यास करने में लगे हुए थे।  नारद जी उनकी इस प्रकार की लगन व अभ्यास को देखकर अति प्रसन्न  हुए और बोले -"भगवन! आप परीक्षा में उत्तीर्ण हो गये लगते हैं। अब आँखें बंद कर कूद जायें चुनावी मैदान में आपकी विजय निश्चित है।"

ये सुनकर भगवानजी का मनोबल बढ़ा। उन्होंने नारद से कहा -"क्यों ना कूदने से पहले एक दो  प्रैस कान्फ्रैन्स रखी जायें ताकि जाने से पूर्व मतदाताओं पे असर हो और ज़्यादा से ज़्यादा लोग  हम, हमारे विचारों से अवगत हो जायें कि हम कौन है और क्यों चुनाव लड़ रहे हैं।"

"अवश्य भगवन।"- नारद जी ने कहा।   

"तो क्यों ना आज के दोपहर के खाने पर ..!"

 "ना..ना!"- नारद ने भगवान जी को टोकते हुए कहा -" दोपहर का नहीं, रात्री के भोजन पर प्रभो..  रात्री के। आप इनकी फ़ितरत को नहीं जानते क्योंकि पत्रकार जीव खाने का नहीं, पीने का ज़्यादा शौकीन होता है और ये, उसे अपना स्टेटिस सिंम्बल भी मानते है। इसके सेवन के पश्चात उसकी बुद्धी,चक्षु व उँगलियाँ खुलकर अपना प्रभाव दिखाती हैं। फिर देखिये कल के अखबारों में, ऊँचे ऊँचे हेडिंगों में  आपका नाम, आपके विचारों का ख़ुलासा, आपकी तारीफ़ों के पुल जिसे पार कर मतदाता आप तक पहुँचेगा।"

नारद जी लगे टेलीफोन पे टेलीफोन करने, प्रैस रिलीजों को फैक्स पे  फैक्स करके रात्री के भोजन का सब को निमन्त्रण पे निमन्त्रण लगे देने।  50-60 पत्रकारों से स्वीकृति पाने के पश्चात नारदजी जुट गये रात्री की भोजन व्यवस्था में।

निर्धारित स्थान व समय पर एक एक करके पत्रकार महोदय साथ में कैमरे, लाइट तथा अन्य ताम झाम को लेकर पहुँचने लगे ।   नारद जी आने वाले हर पत्रकार का बडे़ विनम्र भाव से स्वागत-सत्कार करते रहे।

आज के नेताजी, याने भगवान जी  को आने में अभी थोड़ी देर लग रही थी। इस बीच में नारद जी ने समय का सद्‌उपयोग करना श्रेयस्कर समझा । उन्होनें पत्रकार महोदयों से कहा.. "देखिये,  नेताजी के आने मे अभी देरी लग रही, क्यों न.. हम तब तक मधुशाला  याने मेरा कहने का मतलब हाट ड्रिंक का सेवन करें।"  इतना कहना था कि  गिद्ध की तरह टूट पडे़ पास में पड़ी बोतलों पर वे सब। आधे घन्टे के अन्तराल में ही ठीक ठाक हो गयी थी पत्रकार मण्डली। इस दौरान भगवान जी भी पधार गये थे ।

सब का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हुए नारद जी कहने लगे- "हे, प्रत्याशियों के भाग्यविधाताओ!  हे, चुनाव व चुनाव में लड़ने वालों पर अंकुश लगाने वाले महारथियो। आज के इस प्रैस कान्फ्रेंस में आप सब का हाiर्दक स्वागत है। हमारे नेताजी" -नारद कुछ कहना चाह रहे थे कि तभी किसी पत्रकार ने सवाल किया--

"आपका परिचय?"

"हम नारद हैं.. ।"

"लगते तो नहीं।" पत्रकार ने छूटते कहा..। यह सुनकर हाल में हँसी का फुहारा छूट पड़ा । नारद जी बात को चालू रखते हुए कहने लगे -

"आपने हमारी प्रैस रिलीज़ तो पढ़ ही ली होगी  कि क्यों हमने नई पार्टी बनाई? यों हम चुनाव लड़ रहे है? क्यों इसकी जरूरत हुई ?"

"मेरा नाम सूघे लाल है, मै उधेड़बुन अखबार से हूँ। कृपया आप अपने नेता जी का परिचय देने का कष्ट करेंगे।"

नारद बोले- "क्यों नहीं.. क्यों नहीं।"  भगवान जी की ओर इशारा करते हुए बोले- "ये भगवान विष्णु जी है .."

तभी सूघे लाल कह उठा- "वैकुंठ वाले, या बोरीवली झोपड़ पट्टी में रहने वाले।"  इतना कहना था कि फिर हँसी फूट पड़ी हाल में।

"फिलहाल हमें भारत के किसी भाग का मानकर चलें तो यही उत्तम रहेगा।"  उन्होने उसका उतर एक सुलझे एवं पारखी के रूप में दिया । तभी किसी ने प्रश्न किया- "आप चुनाव क्यों लड़ रहे हो? कुछ रोशनी डालेंगे इस पर ?"

"हमारे भगवान बडे़ दयालु हैं। वे अपने भक्तों याने मतदाताओं के दुखों को नहीं देख पा रहे हैं। यूँ तो यहाँ उनका शोषण सदियों से होता आया है लेकिन जब से उन्होंने आज़ादी पाई तब से उसकी हालत दिनों-दिन और भी बिगड़ती जा रही है। जिन नेताओं ने उसकी खुशहाली के लिए काम करना था, वे ही उसे लूट खसोट रहे है। गरीबों को गरीबी की रेखा से उपर लाकर उठाने के संकल्प लेकर उतरे हैं हम इस चुनाव में।"

"तो गरीबी आपका चुनावी मुद्दा है।"

"जी ..हाँ।"  नारद बोले ..।

 तभी आवाज आई- "नारदजी आप ही बोलेंगे या नेताजी को भी कुछ कहने का मौका दोगे। "

 "क्यों नही क्यों नहीं!"

जैसे ही भगवान जी बोले फ्‍लैश लाइटों ने आँखे चौंधिया दीं। कैमरे वाले लगे एक दूसरे के कन्धों पे चढ़ने । प्रशकार्ताओं ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी। भगवान भी सोच सोच कर, नारद की ओर देख देख कर नपे तुले शब्दों मे अपना उत्तर देते रहे ।

"आपका परिचय?"

"आम आदमी में से मैं भी एक हूँ। क्या इतना प्रयाप्त नही ?"

"आप किस पार्टी से है..जनता, भारतीय जनता, जनवदी  जनतंत्र...?"

"जी.. मैं मानववादी हूँ .. गरीब दल हमारी पार्टी है।  जिसमे अमीरों के लिए कोइ जगह नहीं है।"

"चलो माना आप गरीबों के हिमायती हैं। चुनाव चिन्ह के बारे में कुछ बतायेंगे आप?"- धाँसू पत्रकार सेंधमार जी ने प्रश्न किया।

भगवान जी कुछ कहते उस से पहले नारद जी बीच मे कूद पडे - "देखिए..चुनाव चिन्ह कुछ भी हो सकता था, जैसे हाथ, पाँव,  उँगली, पैर, लठ्ठ, लोटा, बंदूक, तमंचा वग्ौरहा वग्ौरहा... लेकिन,  ये सब तो,  किसी न किसी ने हथिया लिए थे। इसीलिए हमने सोच समझ कर इन सबसे हट कर एक अलग से चुना है अपना चुनाच चिन्ह।"

"वो क्या है?"

"डा - ल - र।"-  इतना कहना था कि सब पत्रकार एक दूसरे का चेहरा देखने लगे।

सेंधमार ने फिर प्रश्न किया - "डालर को देख कर ऐसा नहीं लगता कि आपको विदेशी ताकतों ने खड़ा किया है?"

"बस्स्स्स्स..!  यही तो कमी है हमारे यहां के बुद्धिजीवियों में कि वे ज्यादा सोचे-समझे बिना झट से निष्कर्ष पर पहुँच कर अपना फैसला भी दे देते हैं।  हमें किसने नहीं, हमें तो हमारी माताश्री ने उतारा है इस चुनाव में।" 

सेंधमार कहाँ छोड़ने वाले थे ...फिर सवाल किया..  "माना आपको आपकी माता जी ने उतारा, मान गये, लेकिन डालर फ़ौरन करंसी क्यों चुना आपने अपना चुनाव चिन्ह? भारतीय रूपये को क्यों नहीं?"

"बड़ा अच्छा प्रश्न किया है आपने। रूपये की कीमत इन्टरनेशनल मार्केट में ना के बारबर है। अपने ही देश में उसकी साख दिन प्रति दिन गिरती जा रही है, ये तो आप भी जानते है । यहाँ पर तो आपको मेरे साथ सहमत होना पड़ेगा। देखिये करंसी तो कंरसी है। चाहे वो रुपया हो या डालर। लक्ष्मी तो लक्ष्मी ही हुई  ना? डालर को, अमीर गरीब सब पहिचानते है। उसकी की भाषा सब जानते हैं। इसके पीछे जब सब दौड़ रहे हैं, तो हमने सोचा इसे देख कर यहाँ का मतदाता भी दौड़ पड़ेगा हमारे पीछे।"

"आपके भगवान जी ने कभी पहले चुनाव लड़ा?" - किसीने प्रश्न किया।

"नहीं।"

 "तो अब क्यों लड़ रहे हैं।"

भगवान बोले-- "हमें तो मतदाताओं की गरीबी ने मजबूर किया है चुनाव लड़ने को।"

"कहाँ से लड़ने का इरादा है?"

"वो तो तय है ही ..देवभूमी से लड़ेंगे।"

"देवभूमी? माने -- भारतख्ण्ड से? जो अभी अभी बना है राज्य?"

"जी हाँ।"

तबतक बीच में सुरतेलाल ने सवाल किया - "आप शादीशुदा है या कँवारे?"

भगवान नारद का चेहरा देखने लगे ... नारद बचाव मुद्रा में बोल उठे--

"मानते हैं आपकी पैनी दृष्टि को .." पत्रकार की ओर मुखातिब हो कर बोले-  "कया नाम बताया आपने..?"

 "सुरतेलाल।’"

"हाँ सुरतेलाल जी..हमारे कुछ पत्रकार भाईयों की ये कोशिश रहती है कि कैसे किसी के घर के अंदर घुसा जाये।  कैसे उँगली पकड़ कर पहुँचा पकड़ा जाय।  माना, ये शादीशुदा है, तो उससे क्या होगा? क्या हमारी महिला मतदाताओं की सारी की सारी वोटें इन्हें पड़ जायेंगी? और माना नहीं हैं शादीशुदा तो? तो क्या सारे कँवारों की वोट इन्हें ही मिलेगी? माना हम कहते हैं कि इनकी सौलह सौ  पटरानियाँ हैं तो कोई करेगा विश्वास? आप करेंगे? आप, आप और आप?" उँगली उठा उठा कर सबसे प्रश्न करते रहे नारद। उनकी इस आक्रमण मुद्रा को देख के हाल में सन्नाटा सा छा गया था। " ..नहीं ना? मुuझे पता था  कोई विश्वास नहीं करेगा।"  भगवान जी की ओर देखकर उन्हें उठने का संकेत देते हुए नारद जी बोले-"नो मोर कोएश्चन? चलिए प्रभौ ..उठिये..उठिये..।"

भगवान जी बोल- "लेकिन वे हम से कुछ प्रश्न पूछना चाह रहे हैं सखे ..।"

"अरर..रे  इस समय यहाँ से जाने में भलाई है भगवन।"-  नारद ने फिर कहा -"ये, आपको लपेटने के चक्कर में हैं। आप समझता क्यों नहीं?" दोनों वहाँ से उठ कर चल दिये।

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