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01.05.2009
 
जब भगवान ने भारत से चुनाव लड़
पाराशर गौड़

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जैसे धरती पर पाँव रखा ही था कि सामने से दो पुलिसवाले आते दिखाई दिये। वो विष्णु और नारद जी को रोक कर सवाल पर सवाल करने लगे..कहाँ से आ रहे हो?...कहाँ जा रहो हो?...क्या करते हो?...आदि आदि। नारद ने उत्तर दिया- "घर से आ रहे हैं और चुनाव कार्यालय की ओर जा रहे हैं।

पुलसिया बोला- "चुनाव लड़ोगे बेटा...?"

नारद जी बोले- "इरादा तो यही है।"

"इधर आ बे नेता के बच्चे। ये थैले में क्या है?" तलाशी लेते लेते उसने भगवान जी की ओर इशारा करते हुए कहा - "इसका क्या नाम है?"

नारद जी न उत्तर दिया - "भगवान...।"

"अब्बै बिष्णु भी बोलना साथ में!" खी..खी करके हँसने के साथ ही उसने दूसरे पुलसिए की तरफ देखा।

"आप सही कह रहे हैं। इनका नाम विष्णु भगवान ही है।" नारद ने कहा।

"बड़ा आया बिष्णु भगवान का बच्चा। चल है भी तो हमें क्या लेना-देना। ये बताओ पैसे-वैसे हैं जेब में कि नहीं।"

"पैसे कैसे पैसे...?" नारद जी ने कहा।

"पैसे नहीं समझते...डालर समझता होगा साला!" पहला दूसरे को देखकर बोला -"अब्बै.. ये कहीं.. अरे नहीं यार शक्ल से तो नहीं लगते।"

"बेटा ..शहर में पोटा लगा हुआ है। एक बार अंदर हो गए तो.. मरकर ही बाहर आओगे नेता जी। बताये देते हैं हम।" नारद जी को धक्का देकर वो बोला -"भग जा यहाँ से सुबह-सुबह बोहनी खराब कर दी। पता नहीं किस मनहूस का मुँह देखकर उठा हूँगा सुबह-सुबह।"

दूसरे ने तपाक से उत्तर दिया -"अपनी बीवी का..और किसका!" सुनकर दोनों हँसने लगे।

विष्णु और नारद जी आये दिन ये ही सोचते रहे कि चुनाव कैसे और कहाँ से लड़ा जाए? चुनाव का मुद्दा क्या हो? जैसे जैसे चुनाव की तारीख नज़दीक आती रही उन्हें बस यही संकोच सताने लगा। एकाएक नारद जी ने कहा -"क्यों न मुद्दा.. गरीबी, दु:ख-तकलीफ़ को रखें? जो यहाँ है, थी और रहेगी भी। ये तो नहीं हटेगी और नहीं समाप्त होगी और न ही इसका कोई हल है।"

भगवान बोले -"ये कोई नयी बात नहीं। इसके बारे में तो यहाँ का बच्चा-बच्चा जानता है। सदियों से वो यही देखता आ रहा है। माना हमने मुद्दा उठाया भी तो कौन करेगा हम पर यकीन? चलो माना थोड़ी देर के लिए माना वे मान लें कि हम गरीबी को हटा देंगे, अगर किसीने यह सवाल कर दिया कि कब और कितना समय लगेगा गरीबी को हटने में.. तो है हमारे पास इसका कोई  जवाब?"

"है भगवन्‌..है..जवाब है। क्यों  न आप ब्रह्मा जी से पूछें। उनके पास इसका जवाब है। क्योंकि वे अजर अमर हैं। उन्हें अवश्य पता होगा कि कब हटेगी।" नारद जी ने आशापूर्व कहा.."बस यही होगा हमारा चुनाव जीतने का ब्रह्मशस्त्र! हम लोगों को बता देंगे कि कब हटेगी गरीबी। वो भी खुश और हम भी खुश.. क्यों?"

"आपकी बात में दम तो है नारद जी।" भगवान बोले -"चलो ब्रह्मा जी का ध्यान लगाते हैं।" आसन लगाकर प्रभो ध्यान लीन हो गए। कुछ देर बाद ब्रह्मा जी प्रकट हुए और बोले -"वत्स कहो कैसे याद किया?"

भगवान बोले - "हे पितामह! हम धर्म संकट में फँसे हैं। लक्ष्मी जी ने हमें ज़िद करके इस मृत्युलोक में चुनाव लड़ने भेज रखा है। हमने अपना चुनाव का मुद्दा गरीबी रखा है.. जो यहाँ है भी। हमें किसी भी कीमत पर चुनाव जीतना है। ये स्वर्ग लोक की इज़्ज़त का प्रश्न भी है। लेकिन हम ये नहीं जानते कि यहाँ से गरीबी कब दूर होगी? अगर वो दिन, वो वार और समय हमें पता लग जाये तो हम जनता को यकीन दिलाने में कामयाब हो जायेंगे। जनता खुश होकर हमें वोट देगी और हम चुनाव जीत जायेंगे।"

"इसमें मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूँ?" ब्रह्मा जी बोले।

भगवान ने कहा -"आप अजर अमर हैं.. हैं ना।"

ब्रह्माजी ने कहा -"हाँ हूँ..।"

"तो शीघ्र बतायें कि कब यहाँ से गरीबी दूर होगी।"

पता नहीं वत्स, तब तक तो मैं भी मर जाऊँगा।" कहकर ब्रह्मा जी अंतरधान हो गए। भगवान मायूस होकर अपना मुँह लटका कर बैठ गए।

नारद जी  ढाँढंस बँधाते हुए कहने लगे -"प्रभो! मायूस न  होइये। ये मृत्युलोक है। यहाँ हर बात का तोड़ मिलता है। कोई न कोई हल मिल जायेगा। आप बस गरीबी पर अपना फ़ोक्स रखें.. बस।" कहते हुए नारद जी उठे - "मैं अभी मार्केट से दो चार टेप लेकर आता हूँ, अमिताभ की, दलीप कुमार की, राजकुमार की.. उनको देख देख कर आपने उनकी आवाज़, अदा, स्टाइल की नकल करनी है। अपने आने वाले भाषणों के लिए कि कब आवाज़ उठानी है, कब गिरानी है किस अदा से और कब हाथ व उँगली उठानी है। ये सारी अदाएँ सीखनी होंगी। आपको मतदाताओं को लुभाने के लिए"

"तो अब ये नौटंकी भी करनी पड़ेगी हमें।" - भगवान जी ने नारद को घूरते हुए कहा।

"करोगे नहीं तो तमाशा कैसे लगेगा? जनता कैसे जुटेगी? वोट कैसे मिलेंगे। और हाँ फ़ोकस याने गरीबी पर ध्यान रहे बस्स..!" नारद ने फिर से ध्यान दिलाया।

"गरीबी के पीछे क्यों लठ्ठ लेके पड़े हो। यहाँ का मतदाता इसके बारे में सब जानता है। पहले राजाओं न खाल खेंची फिर 150 से अधिक सालों तक अंग्रेज़ों ने चूसा। जब से आजादी मिली पिछले 56 सालों से अपने ही लूट खसोट मचा रहे हैं, ये बात वे सब जानते हैं।"

नारद बोले -"जानते हैं..जानते हैं। वे भी जानते हैं। हम भी जानते है और दुनिया वाले भी जानते हैं। आपको उनके सेन्टीमेन्ट से खेलना है। उनको रोटी कपड़ा और मकान के सब्ज़बाग दिखाने हैं। अपने भाषणों में आपने उन्हें खुशहाली के सपने बेचने हैं। पर भर के लिए उन्हें ये अहसास दिलाना है कि वे भी अमीर बन सकते हैं। सिर्फ़ वोट देकर। उनसे बार बार कहना होगा कि हम तो इतना कर रहे हैं, दे रहे हैं। आपने तो केवल वोट देना है.. सिर्फ़ एक वोट।"

"चलिए मुद्दा तो हो गया। चुनाव चिन्ह के बारे में सोचा है कुछ आपने?" - भगवान जी बोले।

नारद जी ने तपाक से उत्तर दिया -"डालर" कैसा रहेगा? सारी की सारी दुनिया पागल हुई पड़ी है इसके पीछे। डालर को देखकर तो आम आदमी व गरीब तो छलाँगें लगायेंगे, छलाँगें.. भगवन!! पागल होके दौड़ेंगे हमारे पीछे।"

भगवान जी ने कहा -"दादा देनी पड़ेगी आपकी खोपड़ी की। क्या चुनाव चिन्ह ढूँढा है आपने। मुद्दा हो गया। चुनाव चिन्ह हो गया। अब पार्टी का क्या नाम रखा जाए?"

"पार्टी...। पार्टी के नाम के बारे में थोड़ा सोचना पड़ेगा भगवन। सारा दारोमदार इसी पर निर्भर करता है। मेरे ख्याल से पार्टी का नाम आम आदमी से जुड़ा होना बहुत ज़रूरी है। जिसे सुनकर वो ये महसूस करे कि यह उसी की पार्टी है।"

"तो बतायें ना जल्दी जल्दी!" भगवान व्याकुल हो गए थे नाम सुनने को।

" ’गरीब दल कैसा रहेगा भगवन?" नारद जी बोले।

"अहऽम...इससे तो लगता है कि हमारे छोले बिक जायेंगे।" भगवान जी ने नारद को देखते हुए कहा- "क्यों न बजरंग दल रखें?"

"नहीं.. नहीं भगवन वो क्या है कि बजरंगदल से पालिटिक्स की बू आ रही है। अलगाव वाद का आभास हो रहा है। इसमें तो किसी एक ख़ास समुदाय की बात आ रही है जबकि हमें तो आम आदमी से जुड़ा रहना बहुत ही ज़रूरी है। आप ये क्यों भूल जाते हैं प्रभो? गरीब शब्द गरीबों का प्रतिनिधित्व करता है। भारत के आम आदमी की छबि उभरती है उसमें। ये आदमी मर जायेगा लेकिन अपने से.. गरीब व गरीबी को कभी भी अलग नहीं होने देगा। बड़ा स्वाभिमानी है यह प्राणी भगवन। यही इसकी कमजोरी भी है। मन मे एक बात बिठा लें- आपने तो बस इसकी इस कामज़ोरी को भुनाना है। इसको लपेट लपेट कर चुनाव जीतना है।" कहकर नारद चुप हो गए।

"समझ गए, समझ गए भली भान्ति समझ गए।" भगवान जी बोले -"अब समस्या खड़ी होती है कि कहाँ से चुनाव लड़ा जाए। बिहार से तो शालू भई हमें जीतने नहीं देंगे। महाराष्ट्र  तो पहले ही कह चुका है ये तो आपणी चै। पंजाब में अकाली हमें घुसने नहीं देंगे। हरियाणा से मन करता है लेकिन वहाँ भी खतरा ही है।" नारद जी को देखकर विष्णु जी बोले -"आप चुप क्यों हैं मुनिवर, कुछ तो सोचिये..।"

"घुमा रहा हूँ खोपड़ी को, देख रहा हूँ कि कहाँ से लड़ा जाए।" नारद जी ने सर पे हाथ फेरते हुए कहा - "मेरे ख़्‍याल से देवभूमि कैसी रहेगी?"

"आपका तात्पर्य पहाड़ यानि भारतखण्ड से तो नहीं है नारद जी?" भगवान जी ने जिज्ञासा बस पूछा।

नारद जी ने कहा -"हाँ प्रभो! अभी अभी तो बना है वो नया राज्य।"

"आपके मुँह में घी-शक्कर! क्या बात है आपकी! नारद जी एक काम कर दें प्लीज़, लक्ष्मी जी को फ़ैक्स कर दें कि चुनाव की सारी तैय्यारियाँ लगभग पूरी हो चुकी हैं..सिवाय नामीनेशन के। वो भी शीघ्र ही पूरी कर लेंगे।"

नामीनेशन का समय नज़दीक आता गया। नारद एवं भगवान जी की चिंतायें भी बढ़ने लगीं। नारद जी ने एक आइडिया दिया कि भगवन क्यों न मतदाताओं के करीब जाकर उनकी नब्ज टटोली जाए। उन्हें सुने कि वो क्या चाहते हैं।

"आइडिया बुरा नहीं है।" कह कर चल दिए दोनों कांस्टिचुएंसी की ओर। जाकर देखा कुछ लोग पंचायत चौंक में बैठे आपस में बतिया रहे थे। एक कह रहा था- "क्या बात है भाइयो जो अब तक ना तो कोई नेता ना कोई पार्टियों के कार्यकत्र्ता और ना ही चुनाव लड़ रही पार्टियाँ ही हमारे पास आई हैं। पिछले चुनाव में तो अब तक पोस्टर बाजी, गाड़ियों की भीड़, नेताओं के लम्बे लम्बे भाषणों से कान फट गए थे। साथ में हम लोगों की भी खूब चाँदी कुटी थी। हरएक को दस-पन्द्रह हज़ार रुपयों के साथ-साथ रोज़ दारू की बोतल और मुगŒ मिलती थी। याद है न सबको।"

सब एक साथ बोले.."हाँ, हाँ अच्छी तरह याद है।"

तो दूसरा बोला -"ठीक है, जितनी देर से आयेंगे हम भी अपने भाव उतने ही ऊँचे बढ़ायेंगे।" बीच में कोई बोला -"लेकिन हम अभी तक ये तय नहीं कर पाये हैं कि वोट किसे देना है?"

तभी कोई नेतानुमा आदमी खड़ा होकर बोला -"सब्र कीजिए भाइयो! हमें एकजुट होकर रहना है। अपनी अन्दरूनी बात का भेद किसी भी पार्टी वालों को न तो देना है और न ही देंगे कि हम किस के साथ हैं। बस यही होगा हमारा हथियार सब पार्टियों के साथ नैगोशियेशन करने के लिए। अगर आप लोगों को एतराज़ न हो तो मुझे अच्छी तरह आता है कि किस मुर्गी को कब और कैसे हलाल करना है। याद है ना.. पिछले चुनाव में मैंने ही आप सब लोगों को दस-पन्द्रह हज़ार रुपये दिलवाये थे.. याद है कि नहीं?" सबने सर हिला कर अपनी अपनी स्वीकृति दी, "याद है, याद है।"-- "तो बस्सऽदेऽऽऽऽऽऽऽ....आने वाली मुर्गियों का इन्तज़ार करो।"

कोने में बैठे एक व्यक्ति ने उठकर कहा -"देखिए, गाँव वालो! वोट एक शक्ति है। एक ऐसी चीज है जो आपकी व हमारी किस्मत बदल सकती है। हमें अपना वोट उस व्यक्ति या पार्टी को देना चाहिए जो हमारे बारे में सोचे, हमारे लिए काम करे। हमें चापलूसियों व सब्ज़बाग दिखाने वालों से बचना ज़रूरी है। आदमी के लिए पैसा ही सब कुछ नहीं है। असूल व सिद्धान्त और ज़मीर भी कुछ होते हैं।"

भीड़ में से कोई चिल्लाया -"अब्बे बैठ जा...बैठ जा! बड़ा आया सिद्धान्तों वाला। सिद्धान्तों की बात करन्ी है तो नेताओं के पास जा। जो हज़ारों करोड़ों डकारते हैं। अरऽऽरे! पैसे तो पैसे क्या वे तो हमारे जानवरों के चारे तक खा जाते हैं। बड़ा आया सिद्धान्तों वाऽऽऽला। जब वे इतना खा रहे हैं..अगर बहती गंगा में हमने डुबकी लगा ली तो तुझे काहे की मिर्ची लगी है।" फिर वह जनता से मुख़ातिब होकर बोला -"क्यों भाइयो?.. " सबने कहा, बिल्कुल सही कह रहा चमनलाल। कहते कहते खी खी कर सब हँसने लगे। चालू रहते चमनलाल बोला -"नेता जब एक पार्टी में से दूसरी पार्टी में जाने के लिए करोड़ों लेता है तो क्य हम पचास साठ हज़ार नहीं ले सकते।" तालियों से चौंक गूँज उठा।

तभी बच्चू बोला -"नेता जी वोट किसे देना है ये तो बताओ?"

नेता बोले -"बच्चू भाई, बतायेंगे बतायेंगे। पहले मुर्गियों को तो आने दो। फिलहाल राज़ को राज़ ही रहने दो। तुम क्या समझते हो, क्या पार्टी वालों ने अपने अपने जासूस नहीं छोड़ रखे होंगे हमारी बातों को जानने व सुनने के लिए। अरररे बड़े काँइयाँ होते हैं ये!"

बच्चू बोला -"फिर तो ठीक है।  हाँ एक बात हमारी भी सुन लो वोट-सोट की बात तो अब हम से करियो ना। ये बता देना कि ठप्पा किस पर मारना है बस्स्ऽऽऽऽ...।"

नारद और भगवान जी अपनी अपनी खोपड़ियाँ खुजलाने लगे। उनके पल्ले कुछ भी नहीं पड़ा कि मतदाता वोट किसे देगा और चाहता क्या है?.. केवल पैसों के सिवा! दोनों बैरंग लौट पड़े अपन शिवर की ओर।

दूसरे दिन लोगों से पूछते पूछते चुनाव कार्यालय की ओर गए। वहाँ पहुँच कर देखा अंदर बाहर गलियारों में सफेद कुर्ते पैजामें पहने व कंधों पर कीमती शालों को लटकाए हज़ारों लोग इधर से उधर, उधर से इधर भागम-भागी दौड़म-दौड़ कर रहे हैं। उन्हें देखकर कौन कह सकता है कि भारत गरीब है। भारत में गरीबी है। सुबह के गए शाम को उनका नंबर आया।

अपने नामीनेशनके पेपरों को बाबू मान्यवर जी के आगे रख कर वे बाबू के उत्तर की प्रतीक्षा करते रहे। मान्यवर ने उनको देखे बिना हाथ आगे बढ़ा कर कहा -"राशन कार्ड...।" इतना कहना था कि भगवान व नारद एक दूसरे का चेहरा देखने लगे कि ये क्या कह रहा है।

नारद बोले -"मान्यवर जी! वो क्या होता है?"

खोपड़ी को उठाकर उसने उन्हें घूरते हुए कहा -"इस देश में रहते हो या बाहर से आये हो? राशन कार्ड नहीं समझते...! अररे इसके बिना ते इस देश में गति है ही नहीं। जीयो तो राशन कार्ड, मरो तो राशन कार्ड, स्कूल-कालेज नौकरी शादी-विवाह के अवसरों में सबसे पहले इसको पूछते हैं। ...नहीं समझे...?"

दोनों ने सिर हिलाया।

"देखो... जैसे बाहर के मुल्कों में ग्रीन कार्ड, सिटिज़न कार्ड या लैंडड कार्ड होते हैं, वैसे ही भारत में राशन कार्ड होता है..राशन कार्ड। राशनों की लाइनों में लगे हो कभी कि नहीं? अररे कुछ खाते-वाते हो कि नहीं?"

"जी ये खाते नहीं।" नारद जी ने कहा।

अचरज से मान्यवर ने उनकी ओर देखा और कहा -"क्या कहा? ..ये खाते नहीं। यहाँ जो खाता नहीं वो तो नेता बन ही नहीं सकता, मैं गारंटी से कहता हूँ। आप चुनाव लड़ने आये हो ना?"

"हाँ।" दोनों ने मुन्डी हिलाई।

"नाम क्या है?"

"जी भगवान"

"भगवान - क्या भगवान, श्रीवास्तव भगवान टोपीवाला भगवान दारूवाला भगवान... " बीच में नारद जी बोल पड़े -"विष्णु।"

पलभर घूरते हुए बोला मान्यवर -"भगवान विष्णु..! फिर कहोगे वैकुंठ से आये हो।"

"जी हाँ।" - नारद बोले।

"देखो मेरा भेजा मत खाओ। वैसे भी लोगों से बात करते करते खोपड़ी खाली हो गई है। पार्टी का नाम?"

"जी....."

"पार्टी भाई पार्टी। अररे बैनर बैनर ... जिसके नीचे तुम चुनाव लड़ोगे।"

"मानव...।" - भगवान बोले।

"मानव क्या? .. मानव वादी?"

"हाँ...हाँ मानव वादी! बिल्कुल सही कहा आपने मान्यवर जी।" -नारद बोले।

"याने मानववादी पार्टी राइट? हमने समजवादी, साम्यवादी, राष्ट्रवादी पार्टियाँ तो सुनी.. लेकिन ये मानव वादी क्या बला है श्रीमान? खैर..छोड़िये ये बतायें कि कहाँ से लड़ोगे?..मेरा मतलब चुनाव से है। है कोइ कांस्टीचुएन्सी दिमाग में?"

"देवभूमि..।" नारद ने झट से जवाब दिया।

"देवभूमि यानि भारतखण्ड?"

"जी हाँ..जी हाँ, वहीं से।"

"मान गए उस्ताद। क्या जगह छाँटी है। अभी अभी तो बना है वो राज्य। खोपड़ी की दाद देनी पड़ेगी आपकी। आप अवश्य जीत जाओगे भय्याऽऽऽ..। अब जरा चुनाव चिन्ह के बारे में भी बता दो, बड़ी कृपया होगी आपकी।" -मान्यवर ने कहा।

"डालर!"

"जी...?"-मान्यवर चौंके किये कहीं विदेशी एजेंट तो नहीं? फिर पूछा चुनाव चिन्ह के बारे में।

"डालर...!"- नारद ने जरा जोर देकर कहा।

"एक बात बताओगे श्रीमान जी। आपको रुपये में क्या कमी दिखी जो आपने डालर को चुना।"

वो क्या है कि इन्टरनेशनल मार्केट में इसकी वैल्यु ना के बराबर है.. इसीलिए ..हमने डालर को चुना। जरा नज़र दौड़ायें तो आज दुनिया इसी के पीछो दौड़ी जा रही है। अगर जीत गए ता यहाँ भी डालर ही डालर होंगे।" -भगवान जी की ओर मुड़कर नारद ने कहा -"क्यों प्रभो...?"

"वेट ए सेकंड।" -मान्यवर ने नारद से कहा -"अभी अभी थोड़ी देर पहले आपने इनका नाम भगवान विष्णु बताया था कि नहीं?"

"सत्य, बिल्कुल सत्य। इनका नाम भगवान भी है। विष्णु भी है। और लोग इन्हें प्रभो के नाम से भी जानते हैं।"

"वाह क्या खूब! अररे भई ऐसा तो नहीं कि थोड़ी देर में आप इन्हें दीनबन्धु, मुरारी के नाम से पुकारने लगो।"

"अवश्य मान्यवर जी, जगत इन्हें इस नाम से भी पुकारता है।"

"कभी भगवान, कभी विष्णु, कभी दीनानाथ, कभी मुरारी...ये तो पैदायशी नेता लग रहा है। वाह बेटे...! तुम अवश्य चुनाव जीतोगे, मैं दावे के साथ कह सकता हूँ।" - मान्यवर ने ज्यादा उलझन श्रेयस्कर न समझते हुए कहा -"इस फार्म पे दस्तखत कर दो।" फार्म को आगे बढ़ाते हुए मान्यवर ने कहा -"अब किस नाम से पुकारूँ आपको श्रीमान?"

"त्रिपुरारी कहिए त्रिपुरारी..।" -नारद ने कागजों को पकड़ते हुए कहा।

"अच्छा, अच्छा बहुत हो गया। जमानत के पैसे भरो और दफ़ा हो जाओ। वो क्या कहाते...।"

नारद ने उत्तर दिया -"नटवर कहिए नटवर। श्रीमान मान्यवर जी।"

"हे भगवान.. मैं तो पागल हो जाऊँगा इसके साथ।" कहकर वह उठ कर दूसरे कमरे कि ओर चल दिया।

नामीनेशन के पेपरों को भगवान जी को थमाते नारद जी बोले -"प्रभो.. पहला चरण पूरा हुआ। अब चुनाव के युद्ध का शंखनाद कर उतरा जाए चुनाव की रणभूमि में।"

चुनाव कार्यालय के बीचोंबीच में खड़े होकर नारद को गले लगाते हुए प्रभु बोले -"सखे! इसके अलावा अब कोई चारा भी तो नहीं रह गया। लड़ना लड़ाना तो जैसे मेरी जन्म कुंडली में विधाता ने शुरू से लिख दिया हो।"

 

कार्यालय से बाहर निकलते हुए नारद भगवान को समझाने लगे -"हे सृष्टि के पालनहार! ..इस चुनाव में साम दण्ड भेद सबका इस्तेमाल होगा। चरित्रों का हनन भी होगा। हमारी बात ध्यान से सुनें..इस चुनाव में तीनों चीज़ों पर विशेषरूप से ध्यान देकर फूँक-फूँक कर कदम रख कर देख देख कर चलें..प्रैस व प्रैसवाले इन्टरनेट और वीडियो..वो भी कैमकोडर को। जबसे इसकी इज़ाद हुई न जाने इसने कितने ही जाने माने दिग्गज नेताओं की ऐसी की तैसी कर दी। तहलका ने तहलका मचा के रख दिया है प्रभो! इस मृत्युलोक में ज़र,जोरू और ज़मीन से भी बचकर चलें। ये तीनों ही चुनाव में सकैण्डलों के मुद्दे बनते हैं और विपक्षी इन्हीं को शिखण्डी के रूप में ढाल बना कर अपने सामने चुनाव लड़ने वाले पर इसका निशाना साधते हैं।"

"आपके कहने का भावार्थ हम समझ गए नारद। हमारा लक्ष्य बैलट-बाक्स, वोट व मतदाता होगा बस्स!" - भगवान ने नारद को यकीन दिलाते हुए उनके कन्धों पर हाथ रख कर घर चलने का आग्रह किया। दोनों घर की और चल दिये।

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