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| 01.05.2009 |
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जब भगवान
ने भारत से चुनाव लड़ा पाराशर गौड़ |
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1
स्वर्ग
लोक में लक्ष्मीजी सुबह सुबह हाथों में गर्म गर्म चाय की प्याली लिए विष्णु
जी पास पँहुचीं। उस समय विष्णु जी शेषनाग की शैय्या में लेटे लेटे नींद का
लुत्फ़ उठा रहे थे। निकट जाकर धीरे से बोलीं- "नाथ! उठिये,
भोर हो गई है। तनिक आँखें खोलिए और ताज़ी ताज़ी ताजमहल चाय का आनंद उठायें।"
भगवान
उठे। चाय की चुस्की लेते हुए उन्होंने लक्ष्मी जी से कहा- "क्या बात है इस
चाय की! बाई दी वे कहाँ से है?"
"दार्जलिंग
इंडिया से।" लक्ष्मी ने उत्तर दिया।
घूँट
मारते मारते उन्होंने कहा- "कुछ भी कहो प्रिये,
बड़ी उम्दा है।" पास में पड़े टी वी कंट्रोल को उठाकर ज्योंही किल्कि किया
टेलीविज़न पर हिन्दोस्तान का भारत दूरदर्शन चैनल खुला,
जिसमें "ब्रेकिंग न्यूज़" आ रही थी।
"ये
आकाशवाणी का दूरदर्शन केन्द्र है। अब आप हेमवंतीनन्दन से समाचार सुनिये।"
भगवान जी
लक्षमी जी से मुख़ातिब होकर बोले- "प्रिये! बोलता बहुत सुन्दर है ये बच्चा।
बड़ा दम है इसकी आवाज़ में। या तो अमिताभ बच्चन की आवाज़ में है या फिर इसकी!
क्यों?"
लक्ष्मी
जी ने सिर हिलाकर उनका समर्थन किया। न्यूज़ चालू थी...
"संसद
में प्रश्नकाल के दौरान प्रधान मंत्री घासीराम ने कहा लोकसभा के अगले चुनाव
3
महीने के बाद किये जायेंगे। जिसे सुनकर विपक्ष की नींदें उड़ गईं,
क्योंकि वे इसके लिए तैयार नहीं थे।
जैसे ही
टी वी पर लक्ष्मीजी ने चुनाव का ऐलान सुना,
दौड़ कर टेलीविज़न का स्विच ऑफ़ कर के भगवान जी के पास आकर बोलीं- "नाथ आप इस
शेषनाग रूपी सोफे पर लेटे लेटे थकते नहीं?
आठों पहर टी वी देखते देखते बोर नहीं होते?"
विष्णु जी
उनका अभिप्राय को नहीं समझे,
बोले- "आपने टी वी क्यों बन्द किया?
प्रिये! ख़्ाबरें आ रहीं थी,
वो
भी चुनाव की।"
"इसीलिए
किया बन्द।" लक्ष्मी जी बोलीं-"अब ध्यान से सुनिए,
हमारी मानिये तो आप कुछ दिनों के लिए भारत भ्रमण पर जाकर इस बार वहाँ चुनाव
में खड़े होकर अपने भक्तों यानि मतदाताओं का उम्मीदवार बन कर उनका कल्याण
करें।"
"मैं
और चुनाव....! लक्ष्मी तुम सठिया तो नहीं गई!! ये कैसी बात कर रही हो?"
कहते कहते फिर टी वी चालू कर दिया।
"क्यों
क्या हुआ?"
लक्ष्मी ने टोकते हुए कहा- "बन्द कीजिए टी वी को। हम आपसे कुछ कह रहे
हैं...,
आप
यहाँ भी हर पल उठक-पटक,
उसकी समस्या,
इसकी समस्या को सुलझाते रहते हैं। ये भी किसी चुनाव से कम थोड़ा है?
फिर वहाँ के चुनाव लड़ने से क्यों कतरा रहे हैं आप?
यूँ भी हज़ारों करोड़ों लोग आपकी मूर्ती के आगे हाथ जोड़े आपसे कुछ न कुछ
माँगते ही रहते हैं। अगर उन्हें पता चलेगा कि आप स्वयं धरती में उनका
प्रतिनिधि बनकर उनके कल्याण के लिए चुनाव लड़ने आये हैं और चुनाव लड़कर
उनकी सारी समस्याओं को दूर कर देंगे। उनके दुखों के संताप को हर कर जीवन
में खुशहाली भर देंगे,
तो
मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि सारे के सारे वोट आपको ही पड़ेंगे।"
भगवान
तनिक गंभीर होकर बोले-"प्रिये! कहीं तुमने सचमुच मन तो नहीं बना लिया है कि
हम भारत में जाकर चुनाव लड़ें?"
लक्ष्मी
ने अपने दोनों ाथों को जोड़कर भगवान जी को पास जाकर विनम्र भाव से कहा-
"हे दीनानाथ! आपने हमारे हृदय की बात को बिन कहे ही समझ लिया। तभी तो संसार
आपको अंतरयामी कह कर पुकारता है प्रभो! मेरी हाiर्दक
इच्छा भी यही है कि आप वहाँ जाकर अवश्य चुनाव लड़ें।"
भगवान जी
को काटो तो खून नहीं! धर्म संकट में फंस गये संकट मोचन! सोचने लग गये
लक्ष्मी की बुद्धि को क्या हो गया?...
समझाते
हुए कहने लगे- "देखो जिसे आप चुनाव समझ रही हो वो चुनाव नहीं महज़ एक धोखा
है,
छल
है,
फरेब है। मतदाताओं की भावनाओं से खेलकर अपना उल्लू सीधा करना है। उन्हें
सब्ज़ बाग दिखाकर पाँच साल तक उनकी आशाओं को अपने पास गिरवी रखना है। समझ गई
हैं आप...?"
विष्णु जी जैसे पलटे तो देखा लक्ष्मी जी कान को फ़ोन लगाये किसी को नंबर
मिलाने पर लगी हुई थीं।
’ये
किसको मिला रही हैं आप....?"
"नारद
जी को..." लक्ष्मी ने कहा और कहकर आसमान की ओर देखने लगी।
"लो
कर लो बात। ये तो हमको भारत भेजकर ही दम लेगी,
ऐसा लगता है।" कहते हुए धम्म से सोफे में धंस गये। इतने में लक्ष्मी जी ने
फोन को एक कान से हटाकर दूसरे पे लगाते हुए कहा- "गुरुदेव प्रणाम...। आप
शीघ्र ही यहाँ चले आयें...नहीं...नहीं... हमें कुछ नहीं सुनना है। आप तुरंत
चले आयें।" बिना कुछ सुने फोन को खट से रख कर भगवान जी से कहने लगी-
"हाँ,
आप
कुछ कह रहे थे,
फरेब है धोखा है...।"
भगवान जी
बोले- "मैं यह कह रहा था जो खेल आप खेलने की सोच रही हैं न... वो बड़ा
कष्टदाय है। उसमें हमारे साथ-साथ आपके खानदान का भी कच्चा चिट्ठा खोला
जायेगा। हमारे,
आपके नाम व चरित्र पर उँगलियाँ उठा उठा कर लांछन लगाये जायेंगे।"
कौन
लगायेगा लांछन?
कौन उठायेगा उँगलियाँ। किसकी हिम्मत है जो ऐसा करेगा।" गुस्से में तपकर
लक्ष्मी जी बोलीं।
"आदमी...प्रिये!
आदमी!!। इस जंतु को आप नहीं जानती और न ही समझ पाओगी। बहुत ऊँची रकम है।"
वार्ता चल
ही रही थी कि नारद जी ने प्रवेश किया- "नारायण! नारायण!! भगवन... कहिए कैसे
याद किया।" भगवान जी ने लक्ष्मी की ओर इशारा करते हुए कहा- "इनसे पूछिए।"
"कहिए
माते क्या आज्ञा है?"
नारद जी ने कहा।
"हमने
निर्णय लिया है कि त्रिलोकीनाथ इस बार भारत में होने वाले चुनाव में खड़े
होकर चुनाव लड़ेंगे। आपको उनके चुनाव का सारा कार्य भार संभालना होगा। एक
सलाहकार के रूप में आपको इनकी चुनाव रणनीति से लेकर पोस्टरबाज़ी तक सब देखना
होगा।" लक्ष्मी जी ने समझाते हुए कहा।
"नारायण...,
नारायण प्रभो... लगता है आपकी फ़जीयत होने वाली है। क्यों हमारी मिट्टी खराब
करवाने में तुली हैं आप। वहाँ हमारी हार निश्चित है माते।"
"हार...
कैसी हार। ये क्या कह रहे हैं ऋषीवर आप! हार.. वो भी तीनों लोक के अधिपति
की! जिनके इशारों के बिना पत्ता तक नहीं हिलता उनकी हार।"
"आप
सत्य कह रही हैं माते।" नारद बोले,
"पत्ते
तो नहीं हिलते मगर वोट जरूर रातों-रात इधर से उधर और उधर से इधर अवश्य गिर
जाते हैं। जो सुबह तक अच्छा खासा जीतता रहता है दोपहर होते होते मुँह के बल
औंधा होकर जमीन चाटता दिखाई देता है। वहाँ गiणत
तो दो मिनट में गड़बड़ा जाता है माते।"
भगवान
विष्णु ने नारद जी की बात का समर्थन करते हुए कहा- "लक्ष्मी नारद जी सत्य
कह रहे हैं। पत्ते हमारे बस में ज़रूर हैं लेकिन वोट... वो हमारे बस से बाहर
है। भारत में कुछ भी होना असंभव नहीं। वहाँ मतदाताओं का भेद पाना बहुत कठिन
काम है। राकेट साइन्स जैसा है प्रिये राकेट साइन्स जैसा।"
"तभी
तो नारद जी को आपके साथ भेज रहे हैं। भेद लगाने और लेने में संसार में इनसे
बढ़कर है कोई?"
यह सुनकर
भगवान तथा नारद एक दूसरे का चेहरा देखने लगे। मायूस होकर भगवान नारद से
बोले- "हे सखे!..एक बार और ट्राई करो। क्या पता मान जाए।"
नारद जी
बड़े विनम्र भाव से लक्ष्मी जी से कहने लगे- "माते! मनुष्य एक रहस्यमयी
प्राणी है। इसका भेद ना तो उसके माता-पिता,
ना
भाई-बन्धु,
ना
सगे-सम्बन्धियों और ना ही उसकी स्वयं अर्धांगिनी को ही होता है। तो ऐसे में
फिर भला हम कैसे उसका भेद मालूम करेंगे?"
लक्ष्मी
जी तुनक कर विष्णु जी से कहने लगी- "देखिये! अगर आप इस चुनाव में भाग नहीं
लेंगे तो हम अपने मायके चले जायेंगे फिर आप ेखते रहियो.. हाँ...।"
भगवान ने
उनके इस रूप को देख कर कहा- "डार्लिंग! ये आप कैसी बात कर रहे हैं...,
आप
जो चाहेंगी वैसा ही होगा।" नारद की ओर देखते हुए बोले- "सखे! प्रस्थान की
तैय्यारियाँ आरम्भ कीजिए।"
भगवान और नारद
जी अपने अपने सूटकेस पैक करने में व्यस्त थे। इतने में लक्ष्मी हाथों में
बाँसुरी लेकर वहाँ दाखिल होते हुए बोलीं-"नाथ! अपने साथ इसे भी रखना न
भूलियेगा। मायूसी में आपका साथ देगी।" बाँसुरी को देते हुए ये कह कर वह चल
दीं।
पुष्प विमान
भगवान तथा नारद जी को लेकर स्वर्ग से सीधे मृत्युलोक की ओर चल पड़ा। भगवान
नारद से बोले- "अब क्या होगा?
मैंने महाभारत लड़ा। 18 औक्षणी सेना का सामना किया। उन्हें परास्त किया,
तब
भी मैं इतना विचलित व घबराया नहीं था जितना आज हूँ। नारद.. न जाने क्यों
मेरा मन किसी अज्ञात मात के भय से काँप रहा है।"
नारद
बोले- "भगवान! वो लड़ाई ..वो लड़ाई तो धर्म और अधर्म की थी। ये लड़ाई...ये
लड़ाई तो वोट व नोट की है। झूठ की है,
फरेब की है। बेइमानी की है,
चाटुकारिता की है। लड़ाई तो लड़ाई है प्रभो!.. चाहे वो ईराक की हो या फिiल्स्तान
की,
जहाँ एक ओर आधुनिक तकनीकी हथियार-राकेट,
मिसाईल,
बाईलौजिक्ल वैपन,
शिक्षित सैनिक और दूसरी ओर ना तो गोली ना बंदूक,
केवल पत्थर के टुकड़े! फिर भी आपस में लड़े जा रहे हैं।"
भगवान ने
नारद की बात को बीच में ही काटते हुए कहा- "इराक पर ये कह कर हमला करना कि
उसके पास बाईलौजिक्ल हथियार हैं,
ये
सरासर झूठ था। हमला करने के लिए दुनिया से झूठ बुलवाया। झूठ का सहारा लेकर
हमला करना कहाँ का औचित्य है?"
नारद
बोले- "भगवन्! अगर आप मुझे क्षमादान दें तो झूठ तो आपने भी बुलवाया था
धर्मराज युधिष्ठर से महाभारत
के युद्ध में।"
यह
कहते-कहते धरती दिखाई दी। दोनों ने मनुष्य रूप धारण किया और चल दिये अपने
लक्ष्य की ओर......। |
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