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08.25.2007
 
बिन तुम्हारे
पाराशर गौड़

बिन तुम्हारे..
हाँ ज़िन्दगी ऐसी हो रही
ज़िन्दगी मेरी जैसी
किश्तों में हो कट रही।

कहने को तो यूँ
सब है सब मगर
एक तुम ही नहीं ...

जीने को तो जी रहा हूँ
ये ज़िन्दगी मगर
ये ज़िन्दगी वो ज़िन्दगी ही नहीं

ये कैसी ज़िन्दगी है जो
ज़िन्दगी को ज़िन्दगी है ढोह रही ...

समझियेगा नहीं कि मैं
अकेला हो गया
चलते चलते रास्तों में
ग़म भी साथ हो लिया
ग़म है दर्द है आपकी
यादें साथ साथ चल रही
ये बात है अलग कि
बात आपसे नहीं हो पा रही ...

चलते चलते क्यों
ठिठकते पाँव है मेरे
ढूँढते है उन लम्हों को
जो कभी थे तेरे-मेरे
धुँधले हो गये हैं निशाँ मगर
तैरते हैं सपने आज भी
वो आँखों में मेरे ...
ये ब्यार भी आती है अजीब सी
आप हो या ना हो ...
आपकी देह की गंध है आ रही ...!


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