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ISSN 2292-9754

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12.31.2016


निपटारा

कितना अच्छा होता, अगर वो कहते,
हम नहीं बोलेंगे तुम्हारे मामले में,
पूरी तरह निजी है,
मामला ये,

कितना अच्छा होता, कि कोई उनसे कहता,
तुम जो समाज का झंडा उठाये,
घुसे चले आ रहे हो,
ज़िन्दगी में किसी और की,
मेहमानखाने से, उनके रसोई घर में,
किसने दिया ये झंडा तुम्हें?

क्यूँकि देश समाज नहीं,
समाज देश नहीं,
और देशों के भी होते हैं समाज,
जो न बोलें सिर्फ़ ताक़तवर की ओर से तो अच्छा,
क्या हुआ गुट निरपेक्षता की सारी संधियों का?
सिर्फ निरपेक्षता की अपेक्षाओं का क्या,
तहज़ीब का,
पर होने की उस हस्ती की ज़िद लिए,
और उठाये उसकी जाने कौन सी ध्वजा,
वो सिर्फ़ कर रहे हैं,
निरंतर एक झंडोत्तोलन की बात।


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